आगरी समुदाय को रेखांकित करती पुस्तकें " आगरी लोकगीते व धवला " तथा " ती "
नगरसेविका प्रभात पाटिल की पुस्तकों का प्रकाशन
सुभाष पांडेय
भायंदर :- मीरा-भायंदर महानगरपालिका की नगरसेविका सौ. प्रभात प्रकाश पाटील द्वारा हाल ही में उनके द्वारा लिखित गीत-संग्रह "आगरी लोकगीते व धवला... " कुल 140 पृष्ठ , मूल्य - 150/- रुपये मात्र एवं कहानी-संग्रह " ती " कुल 120 पृष्ठ तथा मूल्य - 200/- रुपये मात्र ' निःशब्द प्रकाशन ' द्वारा प्रथम संस्करण आम लोगों तक पहुंची है। लेखिका ने दोनों पुस्तकों को अपने माता स्व. शांताबाई सुंदर सालवी एवं पिता स्व. सुंदर सीताराम सालवी तथा बहन वत्सला एकनाथ भोईर को अर्पित की है। गौरतलब है कि, वे ' आगरी सेना ' के संस्थापक अध्यक्ष व नामचीन व्यक्तित्व राजाराम सालवी की बहन हैं।वे मीरा-भायंदर में सन (1991 से 2017) लगभग 6 बार नगरसेविका रह चुकी हैं। उन्होंने ' शिक्षण में डिप्लोमा ' किया है। 28 वर्ष शिक्षिका के रूप में अपनी सेवाएं दी हैं। उनके 2 बेटे पीयूष व प्रतिक हैं तथा एक बिटिया मनस्वी म्हात्रे ' मीरा-भायंदर महानगरपालिका ' में सिस्टम मैनेजर के पोस्ट पर हैं। उनके पति समाजसेवक,'सादा जीवन, उच्च विचार ' के धनी नाट्य, कला, साहित्य, संगीत आदि विविध सांस्कृतिक, साहित्यिक क्षेत्रों से जुड़े हैं। वे भी ' बहुमुखी प्रतिभा ' के धनी हैं। समाज मे बहुत मान-सम्मान है। सौ. प्रभात प्रकाश पाटील के ससुर मोरेश्वर पाटील स्वतंत्रता-सेनानी थे। अक्सर, दिल्ली आना-जाना रहता था। खासकर देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी जी तत्पश्चात राजीव गांधी तीन पीढ़ियों ' गांधी परिवार 'और कांग्रेस के केंद्रीय एवं राजकीय कमिटी के सदस्यों, पदाधिकारियों के गहन संबंध था।' व्यक्तिगत एवं पारिवारिक संक्षेप परिचय ' पर नाममात्र प्रकाश डालने का प्रयास किया है। शिक्षिका, लेखिका सौ. प्रभात प्रकाश पाटील मीरा-भायंदर ही नहीं सम्पूर्ण थाणे जिला समेत, कोकण परिक्षेत्र में एक ' बड़ा घराना, बड़ा नाम ' से लोग जानते हैं।
अब हम दोनों पुस्तकों के संदर्भ में चर्चा करेंगे, जानेंगे, पढ़ेंगे,व समझेंगे। क्योंकि, सौ. प्रभात प्रकाश पाटील द्वारा बड़े ही श्रम से, मेहनत से लिखित यह दोनों पुस्तक ' अति महत्वपूर्ण पुस्तकें ' हैं। इन दुर्लभ पुस्तकों को खरीदकर, सहेजकर स्वयं पढ़ें, अपने बच्चों, इस्ट मित्रों को भी पढ़ाएं । साथ ही ' स्कूल-कॉलेज-यूनिवर्सिटी ' समेत अन्य पुस्तकालयों में ' डोनेट ' भी करें।
"आगरी लोकगीते व धवला...." पुस्तक में लेखिका ने अपने प्रस्तावना में लिखा है :- " मुम्बई, ठाणे, रायगढ़ ह्या तीन जिल्ह्यंमध्ये प्रामुख्याने वसलेला असा हा आगरी समाज. आपल्या वेगळ्या वैशिष्टयामुळे सध्या सांस्कृतिक क्षेत्रात आपले वेगळे अस्तित्व निर्माण करत आहे.
ह्या समाजाची वेगळी खाद्यसंस्कृति आहे. त्यांचा पोषाख हा वेगळा भाग आहे. त्यांचे रहाणीमान हाही वेगळा विषय आहे. त्यांचा व्यवसाय-उदयोग है सुद्धा वेगळा प्रांत आहे. त्यांची आगरी भाषा हा भाषा संशोधनाचा विषय आहे. "
रचनाकार सौ. प्रभात प्रकाश पाटील ने अपनी पुस्तक ' आगरी लोकगीते व धवला ....' के ' प्रस्तावना ' में आगरी समाज, आगरी संस्कृति, आगरी भाषा, आगरी व्यंजन, आगरी रीति-रिवाज़, आगरी मेज़बानी, आगरी साहित्य , आगरी जीवन पर भरपूर प्रकाश डाला है। उन्होंने पारंपरिक गीतों को लयबद्ध करने का सार्थक प्रयास किया है। लोग स्वयं एवं सामूहिक रूप से संबंधित प्रसंग आने पर लयबद्ध तरीके से गा सकते हैं। उन्होंने आगरी गीतों को लयबद्ध करने का ' ऐतिहासिक कार्य ' अपने लेखनी और इस प्रकाशित पुस्तक के माध्यम से किया है। आगरी-समाज से संबंधित अचार-विचार, भावना , विविध प्रसंगों को नाद, माधुर्य, रूढ़ि-परंपरा के अनुरूप काव्यात्मक ढंग से प्रस्तुतिकरण करने का सुकार्य किया है।
कवियत्री पाटील प्रस्तावना में लिखती हैं कि, आगरी भाषा संशोधन का विषय है। महाराष्ट्र में हर दो किलोमीटर पर बोली-भाषा बदलती है। आगरी भाषा के साथ भी यही प्रसंग है ऐसा कहना कोई अपवाद नहीं होगा। उन्होंने बताया कि, कळवा ( उनका मैहर) तथा नई मुम्बई एवं भाईंदर ( उनकी ससुराल ) में व्याप्त आगरी बोली-भाषा में, उच्चारण में काफी फरक है, उसको जानना-समझना जरूरी है। उन्होंने सभी गीतों के लिखने, प्रेरणा देने, संयोजन करने के लिए उनकी माता स्व. शांताबाई सुंदर सालवी, बड़ी बहन स्व. वत्सला एकनाथ भोईर का विशेष योगदान रहा।
भाईंदर में सुशीला काशीनाथ राऊत ( मोर्वा गांव) ,नर्मदा गणपत पाटील (मोर्वा गांव) , एवं चचेरी सास सौ. जयाबाई दिवाकर पाटील, सौ. सुमन श्रीधर पाटील, श्रीम. सुनंदा केसरीनाथ पाटील, श्रीमती गिरिजा एकनाथ पाटील, श्रीमती दमयंती महादेव पाटील, सौ. भानूमती दत्तात्रय पाटील ( नवघर गांव ) इन सभी का इस पुस्तक को तैयार करने में अमूल्य योगदान है।
गीतकार सौ. प्रभात प्रकाश पाटील ने इस पुस्तक के आरंभ में होली गीत जोकि, मैहर (मायके) में गाया जाता है। उस 'होली गीत ' का सजीव चित्रण समझाकर किया है। इस गीत में संगीत के साथ-साथ नृत्य भी है। नृत्य की महिमा भी बताई गई है। ' चंद्रकला साड़ी ' आगरी स्त्रियों का परिधान है। पैठणी साड़ी मान-सम्मान है।
माहेर होली गीत के प्रस्तुत बंद देखिये :-
काली काली बा चन्द्रकला
जरू, जरू बा किनारीला
पितू, पितू बा पदराला
रं तू शिमगोजी माज्या बंधू
रं तू बयनीला मूलु जाशी
रं तू बयनीला काय न्हेशी
नेईन गोराच्या गोरु भेल्या
नेईन काली का चंदरकला
गं तू हावलाये भावजुले
किती रांधिशी कबिल्याला
तुजे कबिल्याचा लोकू भारी
शब्दार्थ - 1) चन्दरकला -चन्दरकला साड़ी, 2) जरू-जर, कलाबूत , 3) पित-पिवळा, 4) मूळ जाणे - बहिणीला बोलावण्याकरीता गाणे, 5) गोरु- गोड, गूळ, 6 ) भेळया-ढेपा , 7 ) कबिला -मोठे कुटुंब
गौरतलब है कि, हर आगरी गीत के पहले गीत का शीर्षक, उसके बाद प्रस्तावना, तब लयबद्ध गीत, तत्प्श्चात शब्दार्थ कवियत्री ने बहुत ही सुंदर , सहज ढंग से प्रस्तुतिकरण किया है। होली पर बहुत सारे गीत हैं। शादी-विवाह के शुभ-प्रसंग पर विविध आगरी गीत, बहन-भाई के पवित्र रिश्ते के मर्म पर बेजोड़ गीत, गौरी-गणपति के खेल व उन पर गीत इस तरह आगरी गीतों की बेशुमार रसधारा बहुत ही काव्यमय-रसमय है। इस पुस्तक को मराठी, ग़ैरमराठी, विशेष कर हर आगरी समाज के बच्चों को, महिलाओं को, छात्रों को , युवाओं को पढ़ना चाहिए। बहुत ही दुर्लभ, रोचक किताब है ये " आगरी लोकगीते व धवला......."
इसी तरह अपनी दूसरी प्रकाशित किताब कहानी-संग्रह " ती " में ग्यारह कहानियों का संग्रह कुल 114 पृष्ठ का तैयार किया है। जिनमें पुढचे पाऊल, मळकी चादर, गळ, पुनर्मिलन, मला आई व्हायचंय, कोष, वीण, शापित, ओझे, मळलेली वाट, साथ सोबत, निर्णय, प्रेमा तुझा रंग कसा इस तरह कुल 13 कहानियों का संग्रह है। ह्रदय को छू जानेवाली ये कहानियां बड़ी ही रोचक, धारा-प्रवाह हैं। दोनों किताबों की छपाई बड़ी ही आकर्षक हैं। दोनों किताबों का अक्षरांकन ' साईं समर्थ ग्राफिक्स ' ने किया है। ' मुख्यपृष्ठ आवरण ' पर कलाकृति विजय शिंदे ने रेखांकित की है। सुंदर दोनों किताबों की छपाई ' ज्योतिर्लिंग ऑफसेट, कोल्हापुर ' हुई है।



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