पंजाब केशरी, अज्ञान तिमिर तरणी,कलिकाल कल्पतरु, युगप्रवर्तक_ आचार्य श्रीमद् विजय वल्लभ सूरीश्वर लजी म.सा.

 72वां स्वर्ग स्मृति दिवस  06 अक्तूबर,2026 पर विशेष

कोटि-कोटि नमन🙇🙏_


दे
श में दो वल्लभ हुए, दोनो ही गुजरात की धन्य धरा से और दोनों पुरुषार्थ की महागाथा रहें.जो युग-युगों तक जन जन को प्रेरित करती रहेंगी.जिनमें एक थे, सरदार साहब जिन्होंने स्तंस्वतंत्रता-संग्राम आंदोलन तथा स्वाधीन भारत के निर्माण में अहम भूमिका निभाई तो दुसरे हुए, पंजाब केशरी जिन्होंने आध्यात्मिक विकास यात्रा में शिक्षा को शामिल कर अभिनव क्रांति का सूत्रपात किया.

बड़ौदा में जन्में छगनभाई ने सत्रह वर्ष की किशोरावस्था में संसार का त्याग किया.विरति धर्म अपना लिया....दीक्षा अंगीकार की उन्होंने जैन-धर्म की विरल विभूति, पीली चादर से प्रख्यात आचार्य श्रीमद विजयानंद सूरीश्वर जी से. यहीं से फिर मुनि बने... वल्लभ हो गए. उन्होंने अपने गुरुवर से जैन धर्म की गहन शिक्षा ग्रहण की और संयम जीवन की आचार संहिता को आत्मसात किया.विक्रम सम्वत 1981में आपको लाहौर में आचार्य पदवी-प्रदान हुई.

"समय की आवश्यकतानुसार तू सरस्वती के मंदिर भी स्थापित करना और विशेष रुप से पंजाब में जैन धर्म को संभालना" अपने गुरुवर, श्रमण संघ के प्रथम आचार्य आत्माराम जी की इन आज्ञाओं को विजय वल्लभ सूरिश्वर जी ने शिरोधार्य किया. उन्होंने शिक्षा के प्रसार-प्रचार के दायित्व का ना केवल बीड़ा उठाया, बल्कि उसे आगे बढ़ाते हुए साकार किया.

श्री वरकाना पार्श्वनाथ विधालय,  पार्श्वनाथ महाविद्यालय फालना, महावीर जैन विधालय समेत शिक्षा के कई केंद्र उनकी ही देन हैं.और यहां से पढ़-लिखकर निकले विधार्थियों ने भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में यशस्वीं हुए. उज्जवल भविष्य के साथ कीर्ति भी खूब अर्जित की. इसीलिए गोड़वाडवासियों के लिए वे शिक्षा के अग्रदूत माने गए. क्योंकि लोगों को अज्ञानता के अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाने में गुरुभगवंत ने यह महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. वर्ष 1927 में श्री पार्श्वनाथ जैन विधालय संस्थान की स्थापना इसका ज्वलंत उदाहरण है.आप इसके संस्थापक थे. पूरा गोड़वाड उनसे उपकृत हुआ.जैन धर्म के महान क्रांतिकारी आचार्य श्रीमद्  विजय वल्लभ सूरिश्वर जी ने शिक्षा पर ही सर्वाधिक बल दिया था.बहु आयामी व्यक्तित्व व कृतित्व के अग्रसर रहें.स्वदेशी आंदोलन में सक्रियता रहीं. मलमल के वस्त्र के स्थान पर खादी को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से स्वयं ने खादी के वस्त्र धारण किए.

हिन्दी,गुजराती,पंजाबी भाषा में साहित्य सर्जन किया, धार्मिक ग्रंथ, जिनागम, पुस्तकें लेखन,स्तवन रचयिता,साहित्य के साक्षात्कार थे.नवजागरण का लक्ष्य लेकर आत्मानंद जैन सभा की स्थापना की. जैन एकता स्थापित करने के लिए यदि आचार्य पदवी छोड़नी पड़े तो उसकी पेशकश भी उन्होंने की.

केवल जिनालय, उपाश्रय, अतिथिभवन, अस्पताल, विधालय के  निर्माण तक  सीमित नहीं रहे, अपितु गुरुभगवंत ने इससे भी आगे बढ़कर श्रावक/श्राविका का उत्तम निर्माण कार्य भी किया. नैतिक मूल्यों से परिचित कराया. उन्होंने धार्मिकता को परलोक से न जोड़ वर्तमान जीवन से जोड़ा. धर्म मुक्ति का पथ ही नहीं, वरन् शांति का मार्ग बताया... धर्म जीवन जीने की कला है और मनुष्य के नैतिक जागृति का उत्कृष्ट उद्गम हैं.

प्रबुद्ध लोगों सहित समाज के सभी वर्ग के लोगों में देशाभिमान को उन्होंने जगाया. यही कारण, महान राजनेता भी उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रहें,  उनके प्रवचनों से प्रेरित होकर सामाजिक सुधार के लिए ... कुरीतियों को मिटाने के लिए लोग/संघ/संगठन संकल्पित हुए. इसलिए वे बड़े समाज सुधारक भी कहे गए.

नाम और काम कालजयी हैं. ॠषि,देवर्षि, राजर्षि ,महर्षि तुल्य अप्रतिम छवि दूसरें शब्दों में अध्यात्म के शिखर पुरुष जिनका लोककल्याण के लिए किए योगदान 84 वर्ष की उनकी जीवन यात्रा जिसमें 67 वर्ष संयम पर्याय के हरेक को हर हमेश आंदोलित और आश्चर्यचकित करते रहें.

उनके कालधर्म और अंतिम यात्रा में सहभागिता में लाखों- श्रदालु भक्तजन जुड़े. मुंबई के तत्कालीन मुख्यमंत्री  मोरारजी भाई देसाई ने वल्लभ सूरिश्वर जी की समाधिस्थल के लिए शेठ मोतीशाह आदिश्वर परिसर पर निर्माण की अनुमति प्रदान की.साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय, सार-सार का गहि रहें थोथा देइ उड़ाय कदाचित कबीरदास जी ने हो ना हो यह दोहा वल्लभ सूरिश्वर जी को सामने रखकर ही लिखा होगा._

जब तक सूरज चांद रहेगा वल्लभ तेरा नाम रहेगा.

पुण्य स्मृति दिवस पर उनके चरणों में कोटिश-कोटिश नमन वंदन...श्री वल्लभ गुरु के चरणों में मैं नीत उठ शीश नमाता हूं.

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