जिनशासन की प्रतिष्ठा संघर्ष से नहीं, अहिंसा, अनेकांत और आपसी सद्भाव से होती है
गच्छवाद, जिनालय विवाद और जैन समाज की एकता अभय चोपड़ा जैन धर्म का मूल आधार अहिंसा, अनेकांतवाद, अपरिग्रह, क्षमा और संयम है। भगवान महावीर की शिक्षाएँ हमें मतभेदों के बीच भी सह-अस्तित्व और परस्पर सम्मान का मार्ग दिखाती हैं। इसलिए गच्छवाद साधु-साध्वी भगवंतों एवं श्रावकों की धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं को समझने का विषय है, आपसी लड़ाई का नहीं। तत्त्वार्थ सूत्र (5/21) का सिद्धांत है – ‘परस्परोपग्रहो जीवानाम्’, अर्थात जीवों का परस्पर एक-दूसरे के उपकार और सहयोग से संबंध है। अनेकांतवाद हमें सिखाता है कि किसी विषय को केवल एक दृष्टिकोण से देखकर अंतिम सत्य घोषित नहीं करना चाहिए। एक तिथि, दो तिथि अथवा अन्य धार्मिक मान्यताएँ साधु-साध्वी भगवंतों और श्रावकों के बीच आस्था एवं परंपरा से जुड़े विषय हैं। इनका समाधान संवाद और शास्त्रीय विवेचना से होना चाहिए, संघर्ष से नहीं। जिनशासन में अनेक नवीन एवं विशाल तीर्थों का निर्माण हो चुका है। कुछ दर्जन तीर्थों और जिनालयों के स्थानीय प्रबंधन, ट्रस्ट अथवा स्वामित्व संबंधी विवादों को सम्पूर्ण जैन समाज का विवाद बनाना उचित नहीं है। ये मूलतः स्थानीय विषय हैं, जि...