साधु-साध्वी गण : क्या आज भी तिरण-तारण जहाज हैं
"णमो लोए सव्व साहूणं"की महिमा वं दन हो सिद्धों की श्रेणी में आने का प्रयत्न करने वाले मुनिराजों को | वंदन हो इस भयावह संसार समुद्र से स्वयं तिरने एवं हमें तारने वाले उन महापुरुषों को | संयम रथ पर आरूढ़ हमारे साधु-साध्वीगण ही निःसंदेह तारण-तारण जहाज हैं | यदि जहाज ही डगमगाने लगे, दिशाहीन हो जाए, बाधाओं से घिर जाए तो क्या कोई भी सुरक्षित रह सकता है? क्या आज हमारे साथ-साथ हमारे संतों का संयममय जीवन पूर्णतया सुरक्षित है? क्या हमें मार्गदर्शन कराने वाले स्वयं सुरक्षित हैं? यदि गंभीरता से चिंतन करें तो इस असुरक्षा का दोषी हम स्वयं को ही पायेंगे। यदि हमारे तारणहार संत कभी रत्नत्रय, संयम मार्ग पर चलते हुए रुकने लगे, कदाचित अस्थिर होने लगे, संयम में कोई बाधा आ जाए तो हमें उनकी सहायता करनी चाहिए | परन्तु आज, हमारी जीवनशैली विभस्त हो रही है, दिन-प्रतिदिन समाज में धर्म के नाम पर आडम्बर, दिखावा, झूठ, भौतिक चकाचौंध, पद और सत्ता की चाह से हम स्वयं से ही दूर होते जा रहे हैं। संत धर्म से डिगते प्राणी को स्थिर करते हैं, परन्तु हम इतने स्वार्थी, लोभी हो रहे हैं कि हम तो संयम में स्थिर संतों को ...