साधु साध्वियों की दुर्घटनाएँ केवल हादसे नहीं, समाज के लिए चेतावनी हैं
साधु-सुरक्षा : समाज की संवेदनशीलता और जिम्मेदारी का प्रश्न धर्म का बदलता स्वरूप और घटती सहभागिता राजेन्द्र जैन महावीर/ सनावद वर्तमान समय में धर्म का स्वरूप तेजी से बदलता दिखाई दे रहा है। श्रद्धा अब व्यवहार से अधिक प्रदर्शन में दिखाई देने लगी है। सोशल मीडिया पर पोस्ट, स्टेटस, रील्स और श्रद्धांजलियाँ देना सरल हो गया है, परंतु साधु-संतों के वास्तविक जीवन संघर्ष, विहार और सुरक्षा के प्रति समाज की सक्रिय भागीदारी लगातार कम होती जा रही है। साधु-संत तप, त्याग और संयम की जीवित प्रतिमाएँ हैं। वे केवल किसी समाज या परंपरा के धार्मिक प्रतिनिधि नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की आध्यात्मिक चेतना हैं। उनका सुरक्षित विहार केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक उत्तरदायित्व भी है। रीवा की दुर्घटना : एक गहरी चेतावनी हाल ही में संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज की शिष्या आर्यिका श्रुतमति माताजी एवं आर्यिका उपशम मति माताजी रीवा में हुई दुर्घटना में समाधि को प्राप्त हुईं। यह घटना केवल एक दुर्घटना नहीं है। यह पूरे समाज की संवेदनशीलता, व्यवस्था और जिम्मेदारी पर गंभीर प्रश्नचिह्न है। पिछले कु...