पर्युषण महापर्व में क्या करे ? क्यों करे ? कैसे करे ?
जैन धर्म में पर्युषण पर्व का अत्याधिक महत्व है
- श्री गुरुप्रेम के आजीवनचरणोपासक प.पू.आ.श्री वि. कुलचंद्र सूरीश्वरजी (K.C.) म.सा.
जैन धर्म में पर्युषण पर्व का अत्याधिक महत्व है।पर्व अर्थात पवित्र दिन।किसी भी जाति,धर्म या समाज के पर्व को देखकर उसकी संस्कृति, सभ्यता और विशेषताओं को समझा जा सकता है।
पर्व दो प्रकार के कहे जा सकते हैं -
1. लौकिक पर्व - जिन पर्वों में सुदेव-सुगुरु-सुधर्म का स्थान नही होता । इनका सम्बंध प्रायः हमारे भौतिक या सामाजिक जीवन से होता है ! ये पर्व हमारे संसार को बढ़ाते हैं । केवल खाना पीना , मौज मस्ती , बाह्य ख़ुशी ही इन पर्वों में दिखाई देती है ।दीपावली,दशहरा,होली,रक्षा बंधन आदि लौकिक पर्व माने जाते है।इन पर्वो को भी लोभजन्य पर्व,विजयजन्य पर्व,भयजन्य पर्व में बांटा गया है।
2. लोकोत्तर पर्व - वो आध्यात्मिक पर्व जिसमे त्याग और साधना की प्रधानता होती है, जिनकी आराधना से हमें मोक्ष सुख प्राप्त होता है ।लौकिक पर्वों में जहां हमारी दृष्टि शरीर, धन, संपत्ति एवं आमोद प्रमोद तक टिकी रहती है। वहां लोकोत्तर पर्व के दिनों में हमारी दृष्टि ऊध्रवमुखी होती है ।हम शरीर से ऊपर उठकर आत्मा का दर्शन करने का प्रयत्न करते हैं ।इन पर्व दिनों में आत्मिक शुद्धि, क्रोध, कषाय आदि का त्याग कर शांति और समता का अभ्यास किया जाता है।
जैन धर्म की दृष्टि में इस प्रकार के लोकोत्तर पर्वों में पर्युषण पर्व का सर्वोत्तम स्थान है। पर्युषण पर्व को पर्वाधिराज, सर्वपर्व शिरोमणि अथवा महापर्व भी कहा गया है। इस पर्व में विशेष साधना की जाती है ।परस्पर वैर विरोध को शांत कर क्षमा प्रेम एवं मैत्री भाव की गंगा बहाई जाती है।
कहा गया है-
मंत्राणा परमेष्टिमन्त्रमहिमा तीर्थेषु शत्रुंज्जयो
दाने प्राणिदया गुणेषु विनयो ब्रह्मव्रतेषु व्रतं
संतोषे नियम: तपस्सु च शम:तत्वेशु सददेशनम
सर्वेषु पर्वसु प्रगदित: श्री पर्वराजस्तथा
अर्थात जैसे मन्त्रों में नवकार मन्त्र है , तीर्थों में शत्रुंजय तीर्थ है , ज्ञानों में केवलज्ञान है , दानों में अभयदान है , व्रतों में ब्रह्मचर्य व्रत है , उसी प्रकार सभी पर्वों में पर्युषण पर्वों की विशेषता जाननी चाहिए ।
प्राकृत भाषा में पर्युषण शब्द के अनेक रूप मिलते हैं । उनमे से दो इस प्रकार हैं –
1. पज्जुसणा ( पर्युषणा ) - पर्युषण शब्द परि उपसर्ग और उष् धातु से बनता है । परि यानि चारों ओर से । उष् यानि जलाना । कर्मरूपी मैल को , कषाय रुपी शत्रुओं को , अपनी आत्मा के सभी दुर्गुणों को चारों ओर से जलाना ही पर्युषण है ।
2. पज्जोसमना ( पर्युपशमना ) - परि उपसर्ग और वस् धातु से भी पर्युषण शब्द बनता है । परि यानि निकट और वस् यानि रहना । आठ दिन अपनी आत्मा के निकट रहना ही पर्युषण है । आत्मा का स्वभाव परम शांति है । सांसारिक दोषों - पापों को छोड़कर मन को धर्मकार्यों में लगाकर शांति का अनुभव कर आत्मभाव में रहना पर्युषण है ।
शास्त्रकार भगवंतों ने पर्युषणा महापर्व के पॉंच विशिष्ट कर्तव्य बताये हैं।
१) अमारि-प्रवर्तन २) साधर्मिक भक्ति ३) क्षमापना ४) अट्ठम तप ५) चैत्यपरिपाटी
शास्त्रों में फ़रमाया है -
"अन्य दिने कृतं पापं पर्वदिने विनश्यन्ति
पर्वदिने कृतं पापं वज्रलेपो भविष्यन्ति"
हमारे अनंत पापों को धोने के लिए पर्व हमें एक अवसर प्रदान करते हैं लेकिन यदि पर्वों में ही पाप का सेवन किया जाता है , तो उसका हमारी आत्मा को घोर परिणाम मिलता है ।
अतः पर्व पर्युषण में -
1. यथाशक्ति तप - कुछ न कुछ तपस्या करनी ही चाहिए । न भी कर सकें तो रात्रि भोजन त्याग , कंदमूल - वनस्पति त्याग एवम् तपस्वियों की सेवा शुश्रूषा करनी चाहिए । ब्रह्मचर्य का पालन हो।
2. व्याख्यान श्रवण - हमें ध्यान से सुनना चाहिए । यह हमारे सम्यग् ज्ञान और दर्शन को पुष्ट कर चारित्र में अवश्य प्रकट होगा - यह भावना रखनी चाहिए ।
3. प्रतिक्रमण - इससे आलोचना भाव से हमारी आत्मा हलकी होती है ।
4. दान धर्म - यथाशक्ति दान देना चाहिए । प्रभु की भक्ति निमित्त देवद्रव्य की वृद्धि करना , सुपात्र दान देना , साधर्मिकों - पशु पक्षियों आदि को दान देना , श्रीफल आदि की प्रभावना आदि सुकृत पर्युषण पर्व में निभाने चाहिए।
5. केश लुंचन - बालों का लोच साधु - साध्वी जी का कृत्य समझा जाता है किन्तु एकांत से ऐसा नही है । श्रावक भी पर्युषण में या पहले केश लोच कर साधुत्व , अहिंसा धर्म एवं कायक्लेश तप की अनुभूति कर सकते हैं ।
6. जिनेश्वर भक्ति - प्रभु की भक्ति उनसे जुड़ने का अनुपम मार्ग है । अष्टप्रकारी पूजा , आंगी रचना , रात्रि भक्ति भावना आदि इसके प्रबल उदाहरण हैं और सभी को इसमें अधिक से अधिक सम्मिलित होना चाहिए ।
आप सभी को सांवत्सरिक मिच्छामी दुक्कडम्
( आचार्यश्री का नई दिल्ली में चातुर्मास चल रहा हैं। )

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