"क्षमा और विनम्रता का गुण व्यक्ति को महान बनाता हे " :- रजतचंद्र विजयजी
क्षमा शब्दों से नही समर्पण भाव से करें
झाबुआ :- भगवान महावीर से यह शिक्षा मिली है की जिसके अंदर क्षमा भाव हे वह वीर हे। "क्षमा वीरस्य भूषणम् "सूत्र को जीवन मे अपनाना जाना चाहिए। क्रोध की सवारी आती तो ज्ञान और क्षमा का गुण रफू चक्कर हो जाता हे। क्षमा शब्दों से नही समर्पण भाव से करना चाहिए। यह पर्युषनण पर्व हमारे जीवन मे क्षमा का भाव दे सकता हे । उपरोक्त प्रेरक उद्बोधन पूज्य मुनिराज रजतचन्द्र विजयजी म.सा. ने आज रविवार स्पेशल में "क्षमापना "विषय पर अष्टान्हिका प्रवचन के अंतिम दिन विशेष प्रवचन मे आज श्री ऋषभदेव बावन जिनालय मे धर्ससभा मे कहें। उन्होने कहा कि जीवन मे सहने का गुण और क्षमा करने का गुण आना चाहिए। जिससे स्वभाव को बदल कर समता भाव प्राप्त कर सकते हे। एक काटा नुकसान कर सकता हे तो हमने हजारो काटे मन मे रख रखे हे सोचो कितना नुकसान हमारा हो सकता हे | बात बात पर क्रोध आये वो बेकार हे।
उन्होंने कहा यह पर्युषण पर्व ऐसे लोगो का कल्याण करने आया हे जो क्रोधी हे और अपना स्वभाव बदल नही सकते हैं। उन्होने कहाँ की क्षमा करना चाहिए क्रोध को त्यागना चाहिए। स्वीकार करना विकास का गुण हे और प्रतिकार करने से विकास रुक जाता हे। लोक प्रसिध्द कोई भी हो सकता हैं, लोकप्रिय हर कोई नही हो सकता हे, जो सहनशील होता वही लोकप्रिय हो सकता हे । अपने जीवन मे छोटी छोटी बातों को सहना सीखे।जो सहता हे वह रहता हे। क्षमा अपने जीवन मे अंगीकार करने का यह पर्युषन पर्व हे । क्षमा से सभी को जीता जा सकता हे। क्रोधी के अवगुण कभी भी प्रगट होंगे । क्षमा और क्रोध मे से क्षमा का चयन करना चाहिए । क्षमा के गुण से आँगन मे खुशियाँ रहती हे । जीनवाणी व्यक्ति के खराब स्वभाव को अच्छे स्वभाव मे बदल सकती हे। क्षमा की जीवन मे परीक्षा होती रहती हे । क्षमा करना और माँगना यह पर्युषण पर्व सिखाता हे । गणधर भी श्रावकों से क्षमा याचना करते हे | शिखर की हजारो सीढ़ीया चढ़ सकते हे किंतु शत्रु के घर की दस सीढ़ी चढ़ने मे सोचते हे।क्षमापना का पर्व अलबेला हे सर्वव्यापी हे कही भी मना सकते हे । हमे ईंट का जवाब पथर से नही क्षमा पुष्प से देना चाहिए । मौन सहन करना सिखाता हैं।संचालन संजय मेहता और संजय काठी ने किया
पर्युषण के चौथे दिवस 6 सिंतबर को सुबह पूज्य मुनिराज श्री रजतचन्द्र विजयजी को महान ग्रंथ "कल्पसूत्र "का वाचन प्रारम्भ करेंगे । ग्रंथ को पूज्य मुनि श्री को वोहराने का लाभ उमेश भावेश मेहता परिवार ने लिया। ग्रंथ को वधाने का लाभ डॉ प्रदीप रखबचन्द्र संघवी परिवार ने लिया। ग्रंथ का प्रथम बासाक्षेप पूजन मनोहर छाजेड, दूसरी मांगु बेन सकलेचा , तीसरी ओ एल जैन , चौथी धर्मचन्द्र मेहता,पांचवी लीलाबेन भंडारी परिवार ने लिया। ग्रंथ की अष्टप्रकारी पूजन का लाभ यशवंत भण्डारी और आरती करने का लाभ मांगुबेन शकलेचा ने लिया।

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