सोवियत रुस क्रांति के प्रणेता " व्लादिमीर लेनिन."
लेनिन को आधुनिक रूस का जनक भी कहा जाता हैं
लेनिन एक ' रुसी क्रांतिकारी ' थे. वे सोवियत संघ और सोवियत रूस में सरकार के प्रमुख रहे थे. उनकी राज नीति विचारधारा ' लेनिनवाद ' के नाम से जानी जाती है. लेनिन रुस को साम्यवाद देने वाला ' कॉमरेड ' था. वें ' बोल्शेविक क्रांति ' के जनक थे. जिन्होंने दुनिया को ' पहली कम्यूनिस्ट सरकार ' दी थी. लेनिन का जन्म ता : 22 अप्रैल 1870 में वोल्गा नदी के किनारे रूस के शहर सिम्बिर्स्क में मध्यमवर्गीय ‘उल्यानोव’ परिवार में हुआ था. उनका पूरा नाम व्लादिमीर इलीइच उल्यानोव था.व्लादिमीर लेनिन का वास्तविक नाम "उल्यानोव" था. उनके पिता विद्यालयों के निरीक्षक थे. अक्टूबर 1917 की ' बोल्शेविक क्रान्ति का सूत्रधार ' लेनिन था.
महानायक लेनिन ने ' कम्युनिस्ट विचारधारा ' के तहत नयी ”आर्थिक नीति” की घोषणा की थी. ' पूंजीवादी व्यवस्था ' को समाप्त करने में उसका बड़ा योगदान रहा. लेनिन ने रूस की आर्थिक दशा तथा राजनीतिक दशा में सुधार लाने में प्रमुख भूमिका निभाई.
लेनिन को ”आधुनिक रूस का जनक ” भी कहा जाता है. लेनिन बहुत ही दूरदर्शी, कर्मठ प्रतिभासम्पन्न, निष्ठावान, , महान् क्रान्तिकारी, दर्शन और कला का प्रखर ज्ञाता था. वह ' साम्यवादी विचारधारा ' का प्रेरक था. वह ' कार्ल मार्क्स ' के सिद्धान्तों के आधार पर रूस में नवीन समाज का निर्माण करना चाहता था.
महज 16 साल की उम्र में उनके पिता का देहांत हो गया. उनके भाई अलेक्जेंडर को सन 1887 में सरकार-विरोधी प्रदर्शन में भाग लेने के लिये फांसी पर लटका कर मार दिया गया. इन घटना का गहरा प्रभाव लेनिन की जिंदगी पर पड़ा. लेनिन के समर्थक उन्हें साम्यवाद का सर्वसर्वा मानते हैं, तो दूसरी ओर उनके विरोधी उन्हें लाखों निर्दोष लोगों की हत्या का दोषी मानते हैं.
लेनिन, कार्ल मार्क्स की विचार धारा से प्रभावित था. जिस कारण उनका दृष्टिकोण साम्यवादी हो गया था. उन्होंने कार्ल मार्क्स की रचनाओं का ' रुसी भाषा ' में बखूबी अनुवाद भी किया था.
सन 1891 में व्लादिमीर लेनिन ने पीट्सबर्ग विश्व विद्यालय से विधि-शास्त्र में उपाधि प्राप्त की और ' एक उग्रवादी दल ' का सदस्य बन गया. बाद में ' मार्क्सवादी विचारधारा ' के अनुरूप उसने मजदूरों के हितों के लिए ' क्रान्तिकारी संगठन ' बनाया. रूस ने उसकी ' क्रान्तिकारी गतिविधियों ' को देखकर सन 1897 से 1900 तक उसे देश से निर्वासित कर दिया गया. उसे पकड़कर जेल में डाला गया .
लेनिन साइबेरिया भाग गया. वहां से स्विटजरलैण्ड चला गया. उसने अपने उग्रवादी विचारों को समाचार पत्रों के माध्यम से जनता तक पहुंचाने का कार्य जारी रखा. उसने ” इस्क्रा ” नामक समाचार-पत्र का सम्पादन किया, उसके विचारों से कई लोग प्रभावित हुए. ये क्रांति की शुरुआत थी.लेनिन बोल्शेविक दल के नेता थे. इनके नेतृत्व में ही रुस में क्रांति हुई. जिसे अक्टूबर क्रांति के नाम से जाना जाता है. इस पार्टी का सन 1917 तक रुस की सत्ता पर अधिकार हो गया था. लेनिन सरकार के प्रमुख बने थे. वे अपनी मृत्यु तक सरकार के प्रमुख रहे उनकी मृत्यु सन 1924 में हुई थी.
उस समय रूस में जार सम्राट निकोलस द्वितीय का शासन था. जार अयोग्य, रूढ़िवादी, कठोर, अत्याचारी था. उसकी पत्नी जर्मन थी. वह भी रूढ़िवादी विचारधारा से प्रेरित थी. उसे रूसी जनता से सहानुभूति नहीं थी. वह उदारवादियों के दमन के लिए जार पर अनुचित दबाव डाला करती थी.
जार के महल में रास्पुटिन नामक साधु का प्रभाव था. जार उसकी कठ पुतली बन गया था.एक प्रकार रास्पुटिन ही शासन चलाया करता था. बगावत करने वाले को क्रूरता से फांसी पर लटका दिया जाता था. और क्रन्तिकारी व्यक्ति को साइबेरिया तथा बर्फीले निर्जन क्षेत्रों में मरने के लिए छोड़ दिया था. भ्रष्टाचार और आतंक इतना अधिक बढ़ गया था कि जनता में भारी असंतोष पैदा हो गया था.
रुस की जमींदारी प्रथा के कारण जागीरदारों और जमींदारों को विशेषाधिकार दिए गए थे. उस वक्त सम्राट की चाटुकारिता करने वाले जमींदारों को बड़े-बड़े सैनिक और असैनिक पदों पर आसीन किया गया था. जो जनता का सिरदर्द बन गए थे.
किसान की दशा दयनीय थी. किसान खुद भुखमरी से मर रहे थे. औद्योगिक उत्पादन में कमी आयी थी. गरीबी, भूखमरी, बेकारी, कालाबाजारी से लोग त्रस्त थे. क्रन्तिकारी बुद्धिजीवि यों पर अत्याचार, चर्च द्वारा अनिवार्य करों का बोझ जनता पर लादना, भ्रष्ट पादरियों का वर्चस्व की वजह रूसी क्रान्ति के लिए प्रमुख कारण बनें.
फल स्वरूप ता. 8 मार्च 1917 को पेट्रोग्राड में करीब 1 लाख मजदूरों ने हड़ताल की, क्रूर जार ने ड्यूमा भंग कर दी और सैनिकों द्वारा कड़ी कार्रवाई करने को कहा गया.
मार्च 1917 की क्रान्ति से पहले ही रूस की बोल्शोविक पार्टी भूमिगत होकर कार्य कर रही थी. सन 1917 की क्रान्ति के साथ ही लेनिन ने अपने कार्यों को गति प्रदान करते हुए सदस्य संख्या में बुद्धि की. उसने नारा लगाया ” सारी सत्ता सोवियतों की है.”हम लोगों ने रुस के महान क्रन्तिकारी लेनिन के बारे में कुछ जानकारी हासिल की है. लेनिन के क्रान्तिकारी, धारदार भाषणों और कार्यों ने मजदूरों और जनता में चेतना भर के जागरूकता ला दी. ता : 4 जुलाई 1917 को राजधानी की सड़कों पर मजदूरों सहित जनता उतर आयी. शान्तिमय प्रदर्शनकारियों पर दमनात्मक कार्रवाई जार द्वारा जारी रही. कुल चार सौ व्यक्ति मारे गये. अनेक गिरफ्तार कर लिये गये, तो कुछ को मृत्युदण्ड दिया. क्रान्तिकारियों को कुचलने के लिए फौज का उपयोग किया गया.
ता : 25 अक्टूबर 1917 को रूस की जनता ने जार के शासन को समाप्त करने के लिए ” खूनी क्रान्ति ” का सहारा लिया. क्रान्ति के उस रूप को देखकर सैनिक हथियार फेंक कर भाग गए. और सरकारी कार्यालयों, रेलवे स्टेशनों तथा सैनिक मुख्यालयों पर लेनिन का कब्जा हो गया.
लेनिन को सर्वेसर्वा मानकर उसको प्रधानमन्त्री बना दिया गया. 2 करोड़ जनता ने लेनिन के नेतृत्व में बोल्शोविक पार्टी को स्वीकारते हुए " लेनिन " को अपना नेता मान लिया. शासन की सत्ता संभालते ही लेनिन ने किसानों को सर्वप्रथम उनकी भूमि लौटाने, भूखों के लिए भोजन की व्यवस्था करवाने का कार्य शुरू कर दिया.
भूमि तथा उद्योगों का राष्ट्रीयकरण किया, नयी आर्थिक नीति के तहत किसानों से आवश्यकता से अधिक अनाज वसूली पर स्थगन लगा दिया, कर निर्धारण को सम्पत्ति की मात्रा के आधार पर लागू किया, गरीबों से अत्यन्त कम, अमीरों से अधिक की वसूली की और कर देने के बाद जो अनाज बकाया होता था , उसे खुले बाजार में बेचने दिया.
आर्थिक-व्यापार से प्रतिबंध हटाकर लघु पैमाने पर उद्योगों की स्थापना, विदेशी पूंजीपतियों को कृषि तथा इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट में लाभ व साझेदारी की रियायत प्रदान की, अनिवार्य श्रम की व्यवस्था को समाप्त किया, स्थिर मुद्रा प्रणाली का विकास किया. इस नयी आर्थिक नीति की वजह के कृषि व उद्योग धंधों में आवश्यक सुधार आया .
रूस एक औद्योगिक राष्ट्र बन गया. वह इतना अधिक शक्तिशाली हो गया कि द्वितीय विश्व युद्ध में जर्मनी के सामने खड़ा हो पाया. चर्च का प्रभुत्व समाप्त कर धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना की. विज्ञान और तकनीकी पर आधारित उद्योग धंधे व सैन्य-शक्ति का गठन किया. सभी जातियों को भाषा और संस्कृति की रक्षा का अधिकार, रोजगार की गारन्टी दी.
ता : 3 मार्च 1918 को जर्मनी से सन्धि की, तथा विदेशी हस्तक्षेप से देश को मुक्ति दिलायी, विशेष रूप से क्रान्तिकारी न्यायालय ” चेका ” की स्थापना करके विरोधियों का दमन किया.
10 हजार विरोधियों को मृत्युदण्ड दिया गया, जार के समस्त परिवार को जुलाई 1918 में गोलियों से भून दिया गया. इस घटना को ”लाल आतंक” का नाम दिया गया.
सन 1918 में लेनिन की बोल्शोविक सरकार ने नया संविधान बनाया, जिसके अनुसार रूस को ”समाजवादी संघात्मक सोवियत गणराज्य” घोषित किया गया. संविधान द्वारा संघात्मक शासन प्रणाली के साथ-साथ अनेक प्रकार की स्वतन्त्रताएं दी गयीं. तथा संविधान में यह अनिवार्य किया गया कि ”जो काम नहीं करेगा, वह खायेगा भी नहीं.
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| सदाशिव माछी |
ता : 21 जनवरी 1924 में 54 वर्ष की आयु में लेनिन का निधन हो गया. लेनिन के शव को रूस में मॉस्को के रेड स्क्वॉयर में सुरक्षित रखा गया है. आज भी प्रतिवर्ष लाखों विदेशी और रूसी लोग उसकी ममी का दर्शन कर अपनी कृतज्ञता प्रकट करते हैं.
लेनिन कहता था, मुझे एक पीढ़ी के युवा दें, और मैं पूरी दुनिया बदल दूंगा. उनका मानना था कि सफलता के तीन राज होते है, पढ़ना , पढ़ना, और पढ़ना. उनका कहना था कि आपका दिल आग पर होना चाहिए, और दिमाग बर्फ पर. लेनिन कहां करता था कि क्रांतिकारी सिद्धांत के बिना क्रांति नहीं हो सकती.
लेनिन के सिद्धांत अनुसार बिना गलती और बीना हार के सीखा नहीं जा सकता. लेनिन कहता था हमें एक आठ साल का बच्चा दें, और हम उसे हमेशा के लिए बॉल्शेविक बना देंगे. लेनिन का कहना था कि कोई समाज में , समाज से मुक्त हो कर नहीं रह सकता. हर क्रांति का मुख्य लक्षण है कि उन साधारण लोगों की संख्या में वृद्धि हो जाना, स्वतंत्र, सक्रीय, और मजबूत रुचि राजनीति में दिखाते हैं.
सन् 1913 - 14 में लेनिन ने दो पुस्तकें लिखीं, "राष्ट्रीयता के प्रश्न पर समीक्षात्मक "विचार" तथा (राष्ट्रोका) आत्मनिर्णय करने का अधिकार." पहली में उसने बूर्ज्वा लोगों के राष्ट्रवाद की तीव्र आलोचना की और श्रमिकों की अंतर्राष्ट्रीयता के सिद्धांतों का समर्थन किया. दूसरी में उसने यह माँग की कि अपने भविष्य का निर्णय करने का राष्ट्रों का अधिकार मान लिया जाए. उसने इस बात पर बल दिया कि गुलामी से छुटकारा पाने का प्रयत्न करनेवाले देशों की सहायता की जाए.
97 साल पहले मर चुके लेनिन की डेड बॉडी अभी तक रूस में सुरक्षित रखी हुई है. लोग ऐसा भी कहते हैं कि लेनिन का मृत शरीर सालों-साल के बाद भी ज्यादा तरोताजा होते जा रहा है.
🔳 प्रस्तुति : सदाशिव माछी. मुंबई. (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।गुजराती दैनिक संदेश व भाईंदर भूमि के लिए लिखते थे)



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