हम भाग्यशाली हे की हमे भगवान महावीर का शासन मिला :- रजतचन्द्र विजयजी

 पर्वों का पर्व हैं पर्युषण


 झाबुआ :-
श्री ऋषभदेव बावन जिनालय में पर्यूषण महापर्व के प्रथम दिवस आचार्य श्री ऋषभचन्द्र सूरीश्वरजी के शिष्य पूज्य मुनिराज श्री रजतचन्द्र विजयजी और मुनिश्री जीतचन्द्र विजयजी की पावन निश्रा मे पर्युषण पर्व प्रारम्भ हुआ।  श्री संघ और चातुर्मास समिति के अनुसार शुक्रवार को पर्युषण पर्व पर सुबह शक्र्स्तव अभिषेक , भक्तामर  पाठ , प्रभु पूजन , व्याख्यान और संध्या मे प्रतिक्रमण तथा प्रभू अंग रचना की गयी।  प्रथम दिवस अष्टान्हिका प्रवचन हेतु अष्टान्हिका ग्रंथ , पूज्य मुनि श्री रजत विजयजी को , लाभार्थी  उमेश मेहता परिवार ने वोहराया | इस ग्रंथ की वासक्षेप पूजन 5 लाभार्थियों यशवंत भंडारी , धर्मचन्द्र मेहता , दीपक बाबूलाल मूथा , मनोज जैन के परिवार सदस्यों ने की |  

मुनिराज ने विशाल धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा हम भाग्यशाली हे की हमे भगवान महावीर का शासन मिला यौ समझो अमृत मिल गया है।  जैसे मंत्रो मे नवकार मंत्र , ग्रंथों में कल्पसूत्र ग्रंथ , तीर्थों मे शत्रुन्जय तीर्थ . वैसे ही पर्व मे पर्युषन महान हे। पर्वों का पर्व हैं पर्युषण।  यह पर्व हमे बहुत कुछ देता हे। आत्म शुद्धि व आत्म सिद्धि का यह पर्व होता हे | यह पर्व विशिष्ट धर्म आराधना करने का पर्व है। रजतचन्द्र विजयजी ने आगे कहा की मानव जीवन एक वॄक्ष हे जिसके 6 फल हे।  आज दो फल की चर्चा करते हुए उन्होंने  ने कहा की प्रथम फल मे प्रत्येक श्रावकों श्राविकाओ को जिनेन्द्र पूजन याने परमात्मा की पूजन अष्ट द्रव्य से उच्च भाव के साथ करना चाहिए।  परमात्मा के मात्र दर्शन से हमारे पाप नष्ट होते हे।  संसार के तत्वों का दर्शन भव भव भटकाता हे।  जबकि परमात्मा दर्शन से वितराग के भाव आते हे।  पहले परमात्मा की आज्ञा फ़िर राजा की आज्ञा यह भाव आना चाहिए।  आत्मा की कमाई के हेतु से पर्युषन पर्व मनाना चाहिए। 

मुनिराज ने कहा कि  कुमारपाल और श्रीपाल जैसा वैभव मिल सकता हे यदि हम आंतरिक धन की प्रप्ति से धर्म कार्य करे।  मानव पूरा जीवन बाहरी धन की प्राप्ति मे समय व्यतीत कर देता हे।  हम राग द्वेष मे फ़से हुए हे।  पर्युषन पर्व आने पर नन्दीश्वर दिप मे भी 8दिन तक देवता भक्ति करते हे।  भगवान की पूजन से आनंद , खुशी , प्रसन्नता मिलती हे।  देव गति या मनुष्य गति का बंध होता हे। परमात्मा पूजन से दुख दुर होते हे आरोग्यता आती हे। परमात्मा की पूजन विनय और समाधि पूर्वक संतोष के साथ करना चाहिए। परमात्मा पूजन से यश रूपी लक्ष्मी और धन रूपी लक्ष्मी प्राप्त होती हे।  दूसरा फल गुरु सेवा हे। Iआहार, उपकरण सुपात्र दान के साथ सुरक्षा भी गुरु को प्रदान करना चाहिए।  महापर्व के 5 कर्तव्य में हिंसा नही करना ,स्वधर्मी वात्सल्य का आयोजन करना, अट्ठम तप.चैत्य परिपाटी और क्षमापना पर्व पर विस्तृत चर्चा की।   प्रवचन के पश्चात धर्मसभा में कुमारी श्रुति महेश शाह मासक्षमण तप के निमंत्रण कार्ड का शुभारंभ मुनिश्री के वासक्षेप द्वारा गुरु समर्पण चातुर्मास समिति एवं श्री संघ तथा शाह परिवार के सदस्यों ने किया।

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