भावनाओं पर नियंत्रण न होना इमोशनल वीकनेस है :- नम्रमुनि

राष्ट्रसंत के पावन सान्निध्य में युवा शिविर आयोजित


मुंबई :-
राष्ट्रसंत गुरुदेव श्री नम्रमुनि महाराज साहेब के पावन सान्निध्य में रविवार को आराध्य भक्ति पार्क में 'इमोशनल फिटनेस - ट्रेन योर माइंड' युवा शिविर सैकड़ों युवाओं की उपस्थिति में आयोजित किया गया। इसमें ओवर थिंकिंग, चिंता, भावनात्मक कमजोरी, संबंधों और मन की स्थिरता के बारे में  गुरुदेव ने आध्यात्मिक मार्गदर्शन दिया। 

 गुरुदेव ने समझाया कि जब कोई परिस्थिति बदली न जा सके तो उसे स्वीकार करके परिस्थिति को नहीं, बल्कि उसके प्रति अपना दृष्टिकोण बदलना ही इमोशनल फिटनेस है। समस्या का सामना करके समाधान खोजना इमोशनल फिटनेस का लक्षण है, जबकि समस्या के सामने रोकर बैठ जाना इमोशनल वीकनेस है।

समस्या को ज़ूम इन नहीं, ज़ूम आउट करो

शिविर में महासतीजी ने प्रयोग के द्वारा समझाया कि हम अक्सर एक ही समस्या के बारे में बार-बार सोचकर उसे मन में बड़ा बना देते हैं। इसके बजाय समस्या को ज़ूम आउट करके उसके सकारात्मक पहलू देखने चाहिए और छोटी समस्याओं के समाधान से बड़ी समस्याओं का सामना करने की क्षमता विकसित करनी चाहिए।

जेनरेशन गैप से मन की 'स्पेस' तक

प्रश्नोत्तरी में युवाओं और माता-पिता के बीच बढ़ते जनरेशन गैप को लेकर गुरुदेव ने कहा कि माता-पिता को अपने विचार संतान पर नहीं थोपने चाहिए और संतान को भी माता-पिता की भावना को समझना चाहिए। उन्होंने हर माता-पिता को संतान को डिपेंडेंट नहीं बल्कि इंडिपेंडेंट बनाने की सीख दी। 

मोबाइल के अत्यधिक उपयोग पर उन्होंने कहा, “मन को रेस्ट की नहीं, स्पेस की जरूरत है।” मन को नकारात्मक विचारों का डंपिंग ग्राउंड न बनाने की सलाह के साथ ओवरथिंकिंग के खिलाफ ध्यान, आत्मचिंतन, संयमित आहार, चोविहार और उपवास जैसी जैन जीवनशैली के महत्व पर प्रकाश डाला।

समाज उत्कर्ष का संकल्प

शिविर में घाटकोपर के विधायक पराग शाह के जन्मदिन पर नई श्मशानभूमि के निर्माण कार्य का शुभारंभ हुआ और घाटकोपर वासियों से अपनी शक्ति अनुसार सहभागी बनने की अपील की गई। परम गुरुदेव ने पशु-पक्षियों के लिए वर्तमान 300 फीट की एनिमल हॉस्पिटल को 3,000 फीट तक विस्तारित करने के पराग शाह के प्रयासों की भी सराहना की।

शिविर का सार बताते हुए परम गुरुदेव ने समझाया कि इमोशनल फिटनेस का मतलब भावनाओं से मुक्त होना नहीं, बल्कि भावनाओं पर संयम पाना है; समस्या से भागना नहीं, उसका सामना करना है; और जब परिस्थिति को बदला न जा सके तो अपने दृष्टिकोण को बदलना है।

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