परम पूज्य आचार्य श्री राजहंस सूरिश्वरजी महाराज साहब
प्रद्युम्नसूरीश्वरजी म.सा.के शिष्यों में से एक हैं
मूल वतन तो खेरालु के पास लुणवा (मंडाली) है, परंतु निवास मुंबई के बोरिवली (ईस्ट) दौलतनगर में था। धार्मिक संस्कारों से ओतप्रोत दौलतनगर में देरासर और उपाश्रय के निकट ही उनका घर था। देरासर एवं उपाश्रय में होने वाले स्तवन, प्रवचन और धर्मवाणी सहज ही उनके श्रवण में आती रहती थी।
पिता चंदुभाई और माता मंजुलाबेन का परिवार शील, संस्कार और सद्गुणों से आलोकित था। विक्रम संवत 2018 में मंजुलाबेन की पावन कुक्षि से उनका जन्म हुआ। चार भाइयों में उनका स्थान तीसरा था। बाल्यकाल से ही उनके जीवन में प्रबल धार्मिक संस्कार थे। साधुओं के पास जाना, उनके साथ बैठना, उनके उपदेश सुनना, उन्हें गोचरी के लिए ले जाना तथा उनकी भक्ति करना उन्हें अत्यंत प्रिय था। दर्शन, पूजा, सामायिक, प्रतिक्रमण तथा धार्मिक अध्ययन नियमित रूप से करते थे। उन्होंने व्यवहारिक शिक्षा भी मैट्रिक तक प्राप्त की, परंतु उनका मन संसार में नहीं लगा। अंतर्मन में स्थित संयम के प्रति गहरी प्रीति उनके आत्मा को निरंतर प्रेरित करती रहती थी।
दौलतनगर में पधारने वाले पूज्य आचार्य भगवंतों का परिचय एवं उपदेश तो उन्हें प्राप्त था ही, परंतु विशेष रूप से पूज्य मुनि श्री प्रद्युम्नविजय म.सा. (वर्तमान आचार्यश्री) के सान्निध्य से उनकी भावना और अधिक दृढ़ बनी। विहार में भी उनके साथ रहकर धार्मिक अध्ययन के साथ संयम का प्रशिक्षण प्राप्त किया। विक्रम संवत २०३४, महा सुदी-२ के दिन प्रबल पुरुषार्थ कर संयम स्वीकार किया तथा पूज्य मुनि श्री प्रद्युम्नविजय म.सा. के शिष्य बने। इस दीक्षा में पूज्य आचार्य श्री विजय धर्मधुरंधरसूरिश्वरजी म.सा. ने विशेष रुचि ली थी।
संयम की विशुद्ध आराधना करते हुए न्याय, व्याकरण, साहित्य, आगम आदि का गहन अध्ययन किया। अपने तीन-तीन वरिष्ठ पूज्यों की छत्रछाया, प्रेरणा और आशीर्वाद से अपने जीवन का श्रेष्ठ निर्माण किया। वयोवृद्ध मुनिराज श्री हीरविजयजी म.सा. की अस्वस्थता के वर्षों में उन्होंने अत्यंत भावपूर्वक कई वर्षों तक उनकी सेवा की। उनकी प्रवचन शक्ति भी अत्यंत प्रभावशाली है तथा बच्चों में धार्मिक संस्कारों का सिंचन एवं अध्ययन कराने की उनमें विशेष लगन है।
उनकी मातुश्री ने भी संयम स्वीकार कर साध्वीजी पद्मलता श्रीजी की शिष्या साध्वीजी मोक्षलत्ता श्रीजी के नाम से चार वर्षों तक सुंदर आराधना कर अपने आत्मा का कल्याण किया।
वरिष्ठों ने उन्हें योग्य जानकर श्री भगवतीसूत्र के योगोद्वहन के उपरांत संवत 2055, मार्गशीर्ष शुक्ल 10, अहमदाबाद (आंबावाड़ी) में गणिपद तथा संवत 2059, वैशाख शुक्ल 9, अहमदाबाद (कांकरिया) में पन्यासपद से विभूषित किया।
अहमदाबाद कांकरिया संघ की स्थापना से लेकर जिनालय एवं उपाश्रय निर्माण आदि कार्यों को अपने पूज्य गुरुभगवंत के साथ रहकर सफलतापूर्वक संपन्न किया। अहमदाबाद पालडी ओपेरा सोसायटी के चातुर्मास के दौरान तीन-तीन वरिष्ठ आचार्य भगवंतों की पावन निश्रा में शासनसम्राट के स्वर्गारोहण-अर्धशताब्दी महोत्सव का विशाल स्तर पर सफल आयोजन एवं संचालन किया। संवत २०५२ में अहमदाबाद जैननगर में अपने उपकारी गुरुभगवंत पूज्य पन्यास श्री प्रद्युम्नविजयजी महाराज की आचार्य पदवी का महोत्सव उनकी इच्छा एवं आज्ञा के अनुसार शासन प्रभावना के साथ आयोजित कर परम गुरुभक्ति का परिचय दिया।
दीक्षा के दिन से लगातार 25 वर्षों तक गुरु निश्रा में रहकर गुरु आज्ञा को मंत्र मानते हुए गुरुभगवंत के प्रत्येक कार्य में उनके साथ रहे। चाहे वह शास्त्र अनुसंधान का कार्य हो, श्री आदीश्वरदादा के अठारह अभिषेक हों, सिद्धगिरिराज के अठारह अभिषेक हों, ग्रंथ संपादन या प्रकाशन का कार्य हो, कनोडा यशोभूमि स्मारक का कार्य हो, विहारधाम हो अथवा ग्रंथ भंडारों के पुनरुद्धार का कार्य—हर कार्य में साथ रहकर गुरु कृपा एवं अनुभव ज्ञान प्राप्त किया।
मुंबई बोरिवली-दौलतनगर श्री शंखेश्वर पार्श्वनाथ जिनालय की अर्धशताब्दी उत्सव के अवसर पर पूज्य गुरुभगवंत ने उन्हें मुंबई चातुर्मास हेतु भेजा। दौलतनगर में प्रथम बार चातुर्मास कर वहाँ के श्रीसंघ को अत्यंत प्रभावित किया। लगातार दो चातुर्मास शासन प्रभावक रहे। उनकी निश्रा में साढ़े तीन वर्ष के बालक से लेकर 80 वर्ष के वृद्ध तक कुल 136 श्रावकों ने रिकॉर्ड रूप से लोच कराया। संवत 2061 में मुंबई में आए जल संकट के समय साधर्मिक भक्ति एवं अनुकंपा का अनुकरणीय कार्य उनकी प्रेरणा से संपन्न हुआ। श्री शंखेश्वर पार्श्वनाथ परमात्मा की अर्धशताब्दी महोत्सव अनेक विशेषताओं से युक्त एवं शासन प्रभावक रहा।
मुंबई में लगातार छह चातुर्मास के दौरान अनेक शासन प्रभावना के कार्य हुए। सांताक्रुज (ईस्ट) श्री तपागच्छ संघ की स्थापना तथा नवीन आराधना भवन का निर्माण उनकी प्रेरणा से हुआ। इन सभी कार्यों में संवत 2064 के मुंबई-माटुंगा चातुर्मास के दौरान विवाह, सगाई आदि सार्वजनिक समारोहों में “सामूहिक रात्रिभोजन निषेध” अभियान सबसे प्रमुख रहा। मुंबई के गुजरात एवं सौराष्ट्र के अनेक समाजों ने सकारात्मक प्रतिसाद देते हुए अपने-अपने समाज में विवाह आदि अवसरों पर रात्रिभोजन नहीं करने की घोषणा की। षण्मुखानंद हॉल में मुंबई में विराजमान सभी गच्छाधिपति, आचार्य भगवंतों एवं पदस्थों की शुभ निश्रा में प्रतिष्ठित श्रावकों एवं सद्गृहस्थों की उपस्थिति में आयोजित “धर्म संसद” में इस निर्णय की घोषणा की गई। जिसकी चर्चा मुंबई के सभी समाचारपत्रों, मासिक पत्रिकाओं एवं समाचार चैनलों में हुई।
पूज्यश्री को योग्य जानकर वरिष्ठों ने बोरिवली-दौलतनगर में संवत 2065, महा वदी-3 को उपाध्याय पदवी तथा महा वदी-6 को आचार्य पदवी से विभूषित किया। आचार्य पदवी के उपलक्ष्य में अनेक वैविध्यपूर्ण एवं शासन प्रभावक अनुष्ठान हुए।
आचार्य पदवी प्राप्त करने के बाद पूज्यश्री ने दो कार्यों को अपने जीवन का प्रमुख उद्देश्य बनाया—
(1) भविष्य की पीढ़ी गुणवान बने, शीलवती नारियाँ तथा शूरवीर पुरुष जन्म लें—इस उद्देश्य से प्राचीन धर्मशास्त्रों एवं आधुनिक विज्ञान के आधार पर गर्भ संस्कार सहित सोलह संस्कारों का कार्य।
(2) समस्त गुजरात में आर्थिक रूप से कमजोर साधर्मिक, जो आर्थिक कारणों से शिक्षा प्राप्त नहीं कर पाते, उन्हें हर प्रकार की सहायता देकर शिक्षित करना ताकि पूरा परिवार आर्थिक रूप से सशक्त बन सके। इस कार्य के लिए ‘JEET’ ट्रस्ट की स्थापना हुई। आज लगभग 4000 विद्यार्थियों को यह ट्रस्ट शिक्षा प्रदान कर रहा है। इसी ट्रस्ट के अंतर्गत नवी मुंबई (बेलापुर) में ‘श्री आदिनाथ विद्यापीठ’ की स्थापना हुई, जहाँ कॉलेज में अध्ययनरत विद्यार्थियों के लिए जैन धर्म के आचार-विचार के अनुरूप रहने एवं भोजन की उत्तम व्यवस्था, साथ ही जिनालय एवं पाठशाला की सुविधा उपलब्ध कराई गई है, जिससे विद्यार्थियों का बाह्य एवं आंतरिक दोनों प्रकार का विकास हो सके।
संवत 2066 के भावनगर चातुर्मास के बाद संवत 2067 का वर्ष इतिहास में स्वर्णाक्षरों से लिखा जाने योग्य सिद्ध हुआ।
श्री शत्रुंजय तीर्थाधिराज की छःरी का पालन करते हुए एक ही वर्ष में पूज्यश्री की निश्रा में पाँच-पाँच संघयात्राएँ संपन्न हुईं।
श्री कदमगिरी तीर्थ पर तलेटी तथा श्री नेमनाथ जिनालय की पुनः प्रतिष्ठा का भव्यातिभव्य महोत्सव पूज्यश्री के मार्गदर्शन में सम्पन्न हुआ।
पूज्य आचार्यश्री के तीन विनयी एवं भक्तिभाव से युक्त शिष्य—मुनिराज श्री मलयगिरि विजयजी महाराज, मुनिराज श्री भाग्यहंस विजयजी महाराज एवं मुनिराज श्री प्रेमहंस विजयजी महाराज—ज्ञान, दर्शन एवं चारित्र की सुंदर आराधना पूज्यश्री की निश्रा में कर रहे हैं।
पूज्यश्री की प्रेरणा एवं मार्गदर्शन से दहिसर (ईस्ट) आनंदनगर में श्री महावीर स्वामी भगवान का शिखरबद्ध जिनालय एवं उपाश्रय का निर्माण हुआ है। इसके अतिरिक्त खंभात के वटादरा गाँव में श्री गोडीजी पार्श्वनाथ भगवान के 200 वर्ष प्राचीन जिनालय के जीर्णोद्धार का कार्य भी सम्पन्न हुआ है।
पूज्यश्री के चरणों में कोटि-कोटि वंदन।

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