आचरण से श्रेष्ठ बनता है मनुष्य : पंन्यास श्री ऋषभरत्न
आगम के गूढ़ रहस्यों की अत्यंत सरल शैली में प्रस्तुति
उज्जैन :- मालवा विभूषण, पूज्य आचार्य श्री विजय वीररत्न सूरीश्वरजी महाराजा की कृपा और आचार्य श्री विजय पद्मभूषणरत्न सूरीश्वरजी महाराजा के सान्निध्य में अरविंद नगर स्थित श्री नागेश्वर पाश्र्वनाथ जैन मंदिर में चल रहे चातुर्मास में अंतगड़दशांग सूत्र का वाचन एवं भावपूर्ण विवेचन हुआ। जिसमें पंन्यास प्रवर श्री ऋषभरत्न विजयजी महाराज ने आगम के गूढ़ रहस्यों को अत्यंत सरल और प्रेरक शैली में प्रस्तुत किया।
गुरुदेव ने प्रवचन में बताया कि अंतगड़दशांग सूत्र में उन महान तपस्वी महापुरुषों का वर्णन है, जिन्होंने कठोर तप, त्याग, संयम और समभाव के माध्यम से समस्त कर्मों का क्षय कर सिद्धपद (मोक्ष) प्राप्त किया। इस आगम के आठ अध्यायों में विभिन्न महापुरुषों के जीवन, साधना और मोक्षगमन का प्रेरणादायी इतिहास समाहित है।
आचरण से श्रेष्ठ बनता है मनुष्य, उम्र या पद से नहीं
गुरुदेव ने विशेष रूप से रेखांकित किया कि मनुष्य को केवल उम्र या पद से वरिष्ठ नहीं, बल्कि अपने आचरण से श्रेष्ठ बनने का प्रयास करना चाहिए। श्रेष्ठता आयु या प्रतिष्ठा से नहीं, बल्कि गुणों, चरित्र और साधना से आती है। प्रत्येक जीव सुख की कामना करता है, और स्थायी सुख बाहरी साधनों से नहीं बल्कि केवल आत्मसाधना से ही संभव है।
पाप कर्मों का क्षय और समभाव की साधना
प्रवचन में आगे बताया गया कि इस आगम में ऐसे कई महापुरुषों का प्रसंग है, जिन्होंने पूर्व में पापकर्मों का बंध किया था, लेकिन प्रभु के मार्ग पर चलकर, सच्चे हृदय से आलोचना-प्रतिक्रमण, तप और संयम के द्वारा अपने जीवन को पूरी तरह बदल दिया। उन्होंने घोर उपसर्गों और परीषहों को भी समभावपूर्वक सहन करते हुए आत्मकल्याण का सर्वोच्च शिखर प्राप्त किया। गुरुदेव ने श्रद्धालुओं को प्रेरित करते हुए कहा कि यदि जीवन में गुणार्जन, तप, समता और प्रभुभक्ति को अपनाया जाए, तो हर व्यक्ति अपने जीवन को सार्थक बना सकता है।
10 अगस्त को हुआ विशेष आयोजन
सोमवार 10 अगस्त को मालवा विभूषण पूज्य आचार्यदेव श्रीमद् विजय वीररत्न सूरीश्वरजी महाराजा की तृतीय पुण्यतिथि पूरी श्रद्धा, भक्ति और गुणानुवाद के साथ मनाई गई।उपस्थित वक्ताओं ने उनके द्वारा शासन को दिए योगदान को याद किया।

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