साधु-साध्वी गण : क्या आज भी तिरण-तारण जहाज हैं

"णमो लोए सव्व साहूणं"की महिमा


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दन हो सिद्धों की श्रेणी में आने का प्रयत्न करने वाले मुनिराजों को | वंदन हो इस भयावह संसार समुद्र से स्वयं तिरने एवं हमें तारने वाले उन महापुरुषों को | संयम रथ पर आरूढ़ हमारे साधु-साध्वीगण ही निःसंदेह तारण-तारण जहाज हैं | यदि जहाज ही डगमगाने लगे, दिशाहीन हो जाए, बाधाओं से घिर जाए तो क्या कोई भी सुरक्षित रह सकता है? क्या आज हमारे साथ-साथ हमारे संतों का संयममय जीवन पूर्णतया सुरक्षित है? क्या हमें मार्गदर्शन कराने वाले स्वयं सुरक्षित हैं? यदि गंभीरता से चिंतन करें तो इस असुरक्षा का दोषी हम स्वयं को ही पायेंगे। यदि हमारे तारणहार संत कभी रत्नत्रय, संयम मार्ग पर चलते हुए रुकने लगे, कदाचित अस्थिर होने लगे, संयम में कोई बाधा आ जाए तो हमें उनकी सहायता करनी चाहिए | परन्तु आज, हमारी जीवनशैली विभस्त हो रही है, दिन-प्रतिदिन समाज में धर्म के नाम पर आडम्बर, दिखावा, झूठ, भौतिक चकाचौंध, पद और सत्ता की चाह से हम स्वयं से ही दूर होते जा रहे हैं। संत धर्म से डिगते प्राणी को स्थिर करते हैं, परन्तु हम इतने स्वार्थी, लोभी हो रहे हैं कि हम तो संयम में स्थिर संतों को डिगाने लग गये हैं।

"हम तो अम्मा पिया हैं उनके, उनको क्यों बहकाते हैं,

स्वयं भटक के चकाचौंध में उनको भी भटकाते हैं॥

टुकड़ों में हम स्वयं ही बंटते, तेरी-मेरी करते हैं,

उनको कर गुमराह स्वार्थवश दोष उन्हीं पे धरते हैं॥"

अभी-अभी थोड़े दिन पहले चातुर्मास के लिये 'संत प्रवेश' का महोत्सव मनाया गया | धन के नशे में चूर इतना कोलाहल ! इतना शोर-गुल, इतना विद्युत का चकाचौंध, जीव-हिंसा का तांडव नृत्य ! ऐसा नजारा तो विवाह-शादियों में भी न देखा होगा | चिंतन का विषय है। क्या जैन समाज का स्तर इतना गिरता जा रहा है? हम किस दिशा की ओर जा रहे हैं। क्या हमारे साधु-संत इतने विवश हो गये । क्या इससे संकट के बादल और अधिक नहीं घिर रहे? जरा विचार करें हमारे साधु-साध्वीगणों के साथ क्या हो रहा है :-

धन प्रदर्शन, अहंकार से मन कुटिल बनाते हम ।

संत हमारे सरल स्वभावी, जीवन जटिल बनाते हम ॥

आए दिन की दुर्घटना से, अमूल्य जीवन को खो देते ।

हम तो स्वार्थ में इतने डूबे, बस दो आँसू रो देते ॥

सहते-सहते श्रेणी चढ़ते करते कोई क्लेश नहीं।

तन तज देते समता, धैर्य से , देते किसी को दोष नहीं ॥

हमारे साधु-संत अनेक कठिनाइयों का सामना करते हैं। फिर भी यदि संयम पालन में कोई दोष लग जाए, कोई त्रुटि हो जाए, उन्हें विनयपूर्वक जागरूक कर सकते हैं। समाज में उनका उपहास न होने दें। वे हमारे परम उपकारी हैं, परम कल्याणकारी हैं। उनका तिरस्कार करना, स्वयं के तिरस्कार के समान है। धार्मिक कार्यक्रमों में बदलाव लाएं, जैन समाज को सुरक्षित करना सम्यक्त्व रत्न को बचाना है।

इसके लिये सर्वप्रथम ध्यान रहे हमारे समाज में किसी असामाजिक तत्वों का हस्तक्षेप न हो, पदाधिकारी विनयवान हों, धन का सदुपयोग हो। श्रावक-श्राविकाएं पारमार्थिक एवं सरल स्वभावी हों, जागरूक हों, सेवाभावी हों।

भगवान महावीर प्रभु की इस चतुर्विध संघ को दिपाते चलें, दिन-प्रतिदिन धर्मभावना बढ़ाते चलें, संत-सतियों की रक्षा-सुरक्षा में हाथों से हाथ मिलाते चलें।

इन्हीं मंगल कामना के साथ, मिच्छामि दुक्कडम्

पूजा बोहरा, चेन्नई 

प्रस्तुति:भगवान् महावीर फाउंडेशन ,चेन्नई।


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