शासकीय आयुर्वेद औषधालय बम्हनी जिला नरसिंहपुर

 मेरा यादगार दिवस 

लोगों ने किया था श्रमदान

 डॉ अरविन्द प्रेमचंद जैन, भोपाल /पुणे 

मध्य प्रदेश शासन के आदेशानुसार मेरी नियुक्ति वैद्य प्रथम श्रेणी (द्वितीय श्रेणी राजपत्रित अधिकारी )के पद पर मर्दापाल बस्तर में 30 सेप्टेम्बर 1975 को हुई थी वहां से 16 दिसम्बर 1975 को मेरा स्थान्तरण बम्हनी जिला नरसिंहपुर होकर पदस्थ हुआ. बस्तर का औषधालय एक घासनुमा भवन में था और बम्हनी में एक कोठरी और दालान में चल  रहा था .

                  एक नवयुवक डॉक्टर जिसमे कुछ करने का जूनून जरूर रहता हैं .बम्हनी  गांव में बादल यानी ब्राह्मण और बुंदेला यानी ठाकुर के बीच सनातनी विवाद रहा और रहता हैं. में चूँकि नरसिंहपुर जिले से था पर गांव की राजनीति बड़ी विचित्र और मेरा गांव में रहने का प्रथमअवसर .यहाँ यदि आप किसी से मिलो तो दूसरे को आपत्ति .ऐसे ही यदि जिस घर में मैं रहता था ,उसके मकान मालिक की लड़ाई यदि पडोसी से हुई तो मानकर चले वो भी आपका दुश्मन हो गया पर एक चिकित्सक के लिए देश की सीमायें छोटी पड़  जाती हैं .

 मेने कुछ समय जैन चैत्यालय में बिताया उसके बाद गांव में किराये का मकान मिला जिसमे मेने अपना ठौर ठिकाना बनाया .मकान मालिक अनंत सिंह बुंदेला थे जिन्होंने निःशुल्क मुझे रखा .

  इसी दौरान मेने सभी वर्गों के बुजुर्ग,प्रभावशाली,सम्मानीय के साथ उठना बैठना शुरू किया .चैत की नवरात्री अधिकांश गांव से शहर गए लड़के अपने गांव कुलदेवी की पूजन में आते हैं .उसी दौरान हरिशंकर शर्मा की भोपाल में टेलीफोन विभाग में नौकरी करते थे वो भी आये .मुलाकात हुई कारण गांव में उस दौरान शिक्षा उतनी नहीं थी .शर्मा जी जिन्हे बादल जी के नाम से पुकारा जाता था .उनसे मेने मित्रता के बाद एक बात का जिक्र किया की गांव में औषधालय भवन की कमी हैं और मेरी इच्छा हैं की यहाँ भवन बने .इस बात की चर्चा मेने बुजुर्ग लोगों से भी की थी तो उन्होंने कहा डॉक्टर साहब यह गांव बहुत बिगड़ैल हैं यहाँ बहुत गन्दी राजनीति होती हैं .आप कुछ न करो .

 

यह बात मेने श्री हरिशंकर  शंर्मा जी को बताया तो उनकी समाज में बहुत अच्छी इज़्ज़त होने के कारण उन्होंने दोनों पक्षों से बात की और 7 अप्रैल 1976 को स्कूल में एक ग्रामसभा हुई और उसमे चरचा करने बाद यह निर्णय हुआ की भवन बनना चाहिए .उसके लिए गांव के बीच में अच्छी जगह हैं जो निर्विवाद हैं .

ग्राम पंचायत  से प्रस्ताव पारित होकर जनपद पंचायत करेली  गया .वहां से यह सुचना आयी की पंचायत  ३०% राशि जमा करना होगी .इस बावत मीटिंग  की तब ग्रामवासियों ने राशि न देकर सहयोग देने का आश्वासन दिया और लगभग 40 हज़ार ईटें और श्रमदान देने को राजी हुए .

 जनपद पंचायत से स्वीकृति मिलने के बाद गांव वासियों में बहुत उत्साह जाग्रत हुआ .तत्समय ग्राम पंचायत के सरपंच श्री साहिब सिंह बुंदेला जिनकी अच्छी धाक थी उन्होंने एक दिन शुभ मुहूर्त  में नीव का काम शुरू किया लगभग १०० ग्रामवासी एक साथ इकठ्ठे होकर एक दिन में नीव खोदी और उसके बाद भवन निर्माण कार्य शुरू हुआ .इसमें सरपंच ने एक लाख ईटें ,सागवान की लकड़ी लगाई गयी कारण गांव से जंगल लगा होना और ईटों के भट्टे होने से भरपूर और मजबूत भवन बनाया गया .

 बम्हनी गांव नरसिहपुर-- सागर राजमार्ग में बरमान घाट से 16 किलोमीटर और बस स्टैंड सुआतला गांव से चार किलोमीटर कच्चा उबड़ खाबड़ रास्ता जो बरसात में घुटने  घुटने  तक  कीचड से भरा  .कष्टप्रद मार्ग .गांव में कच्ची सड़के ,बिजली का पूर्णतया आभाव .रहने का मकान कच्चा .कोई गांव में बर्तन साफ़ करने वाला बरौआ नहीं .स्वयं कभी कभी अपने हाथों से बर्तन साफ़ करो ,कच्चा फर्श खुद  गोबर से लीपो .कुआँ से पानी भरो कुआँ पर जाकर नहाओ .खुले मैदान में शौच को जाओ .गर्मियों में दूध न मिलना ,गर्मी दुखमय ,बरसात दुखतम और ठण्ड भी ठीक ठाक .

 रहने का स्थान 6 गुना 12 की जगह जिसमे पहले मकान मालिक भूसा रखते थे .उसका मेने तीन खंड बनाये पहला 4  बाई 4 में ड्राइंग रूम , 4 बाई 4 में बैडरूम और  4 बाई 4 में किचिन .किचिन  में .दुहरे आंच का चूल्हा जिसको लकड़ी से जलाओ और खाना बनाओ .यधपि स्टोव भी था . देसी कुकर बनाया जिसमे एल्युमीनियम का बड़ा डब्बा उसमे थोड़ा पानी भर कर एक लोहे का गोले आकार का रिंग और उसमे टिफ़िन के तीन डब्बे जिसमे नीचे वाले में दाल ,बीच वाले में चावल और ऊपर वाले में सब्जी रखकर मंद आंच पर रखकर औषधालय जाना करीब 3 घंटे बाद में सब पक जाते और चपातियां सुबह बनाकर जाता था .खाना खाने के बाद दोपहर में 2 घंटे आराम ,चाय पी शाम की ड्यूटी.

ड्यूटी के बाद जान पहचान होने के कारण गांव के युवाओं से अच्छी जान पहचान और पकड़ होने से  ताश खेलना ,चौपड़ खेलना और कबड्डी खेलना और एक दो सेवक बन गए थे मदद के लिए 

                गांव में पदस्थापना होने के कारण शादी विवाह के कम सम्बन्ध आते थे .क्योकि पिताजी माताजी भाई बहिन नरसिंहपुर में रहते थे .शहरी होने बाद मैं ग्रामीण बन गया था ,समय के साथ मेने सुआतला में भी अपना निजी दवाखाना खोल लिया था .उस स्थान के कारण क्षेत्र में अच्छी जान पहचान हो गयी थी ,खूब काम किया ,खूब, यश धन कमाया .खूब सेवा की .शर्मा जी जब भोपाल से बम्हनी गांव आते उतने दिन दवाखाना बंद .उनकी रिश्तेदारियां रेहली,खमरिया ,बिलहरा देवरी में होने से घूमना ,पिकनिक बनाना होता था .औषधालय भवन तैयार हुआ जो आज भी पुराणी यादें तरोताजा करती हैं 

 यही पर रहकर मेरी शादी वर्ष 1981 में सागर में हुई. .श्रीमती सरिता सागर की होने  के कारण बहुत कठिन दौर रहा पर इसी दौरान मेरी बिटिया ओनीशाका जन्म हुआ .और जुलाई १९८२ में मेर स्थानांतरण शासकीय आयुर्वेद चिकित्सालय सागर का हुआ .

                बम्हनी,सुआतला और आस पास के ग्रामीण जनो का बहुत अधिक स्नेह होने से मेरा स्थानांतरण रुकवाने का प्रयास किया .मेने सबसे अपने उज्जवल भविष्य के लिए अनुरोध किया .आज के दिन विश्व स्वास्थ्य दिवस होने पर बम्हनी औषधालय का भवन मेरी स्मृतियों से जुडी हैं .

               इस स्तुत्य कार्य में सर्व श्री हरिशंकर शर्मा ,श्री बलराम तिवारी ,ब्रह्मपुरिया ,गोकुल सोनी ,साहब सिंह बुंदेला ,सरपंच ,उनके बड़े भाई बद्रीसिंह ग्राम पटेल अंतु सिंह और न जाने कितने लोगो ने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष सहयोग दिया उनका हमेशा आभारी और कृतज्ञ रहूँगा .

 आज जहाँ भी हूँ बम्हनी गांव के अनुभव ,वहां का जल ,वायु ,अग्नि, अन्न का बहुत उपकार हैं .वहां से विषम परिस्थितियों से कैसे संघर्ष करना और विजयी होना .मेरे जन्म दाता माता पिता थे पर उस गांव में मुझे हर घर से बहुत प्यार और लाड मिला . 

 -विद्यावाचस्पति   डॉक्टर  अरविन्द प्रेमचंद जैन-- ,संरक्षक शाकाहार परिषद् ,A2 /104  पेसिफिक ब्लू,नियर डी ,होशंगाबाद रोड, भोपाल 462026  मोबाइल 09425006753

वर्तमान पता --- सी/504 एस्टेट ,कांटे बस्ती , पिम्पले सौदागर ,पुणे  411027

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