वल्लभ समुदाय व जिनशासन का गौरव परम वंदनीय आचार्य श्री जनकचन्द्र सूरीश्वर जी म.सा.
प्रवचनों व सेवा के माध्यम से धर्म और नैतिकता का प्रचार किया।
1.लगभग सन् 1925 यानि वि.सं. 1982 की ज्येष्ठ वदी पंचमी को गुजरात के जम्बूसर (बड़ौदा के निकट) में सुश्रावक डाह्या भाई और तारा बहन के घर ‘सुरेन्द्र’ के रूप में आपका जन्म हुआ। वरकाणा तीर्थ में उपधान तप करते समय बालक सुरेन्द्र को वैराग्य जागृत हुआ और उन्होंने वि.सं. 2000 में मार्गशीर्ष कृष्णा प्रतिपदा को आचार्य ललित सूरीश्वरजी से मुनि दीक्षा लेकर "जनक विजय" नाम प्राप्त किया।
2. दीक्षा के 11 माह पश्चात गुरु चतुर विजय जी के स्वर्गारोहण पर उनकी आज्ञा के अनुसार आपने गुरु वल्लभ सूरिजी के सान्निध्य में अध्ययन व सेवा का पावन जीवन आरंभ किया। कई वर्षों तक आप गुरु वल्लभ की छत्रछाया में रहे। आपके परिवार से वल्लभ समुदाय में 10+ दीक्षाएं सम्पन्न हो चुकी हैं।
3. आप अति विद्वान थे। प्राकृत व आगम अध्ययन के साथ आपने संस्कृत साहित्य, व्याकरण, और न्यायशास्त्र का विशद अध्ययन पंडित रामकिशोर पांडे जी से किया। आपकी रुचि विशेष रूप से न्यायशास्त्र में गहन थी।
4. सूरत में आचार्य विजय समुद्रसूरीश्वरजी ने आपको गणि पद से विभूषित किया और बाद में गुरु इन्द्रदिन्न जी ने जनवरी 1984 में बड़ौदा में आपको आचार्य पद प्रदान किया गया, इस समय मुनि चिदानंद विजय एवं मुनि धर्मरत्न विजय जी की भी दीक्षा हुई थी।
5. आपने लुधियाना, अंबाला, नकोदर आदि क्षेत्रों में महिला मंडलों, शिक्षण संस्थानों की स्थापना कर नारी जागरण को नई दिशा दी। आपने नारी को समाज की “रीढ़” कहा। पंजाब में महिला मंडलों के गठन का, धार्मिक शिविर लगाने की शुरुआत का श्रेय आपको ही जाता है। पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तरप्रदेश आदि में शिविरों, प्रवचनों व सेवा के माध्यम से धर्म और नैतिकता का प्रचार किया।
6. आचार्य विजय समुद्र सूरिजी म. ने तीन प्रतिभाशाली मुनियों ज्ञानप्रभाकर मुनि जयानंद विजय, श्रुतभास्कर मुनि धर्मधुरंधर विजयजी और शांतिदूत मुनि नित्यानंद विजयजी के सार संभाल का दायित्व आपको सौंपा था। आपने दिन-रात उन तीनों बाल मुनियों को पढ़ाया था।
7. शाकाहार सम्मेलन, व्यसनमुक्ति अभियान, नशाबंदी आंदोलन जैसे सामाजिक अभियानों में सक्रिय भूमिका निभाई। कई अजैन भाइयों को आपने जैन बनाया। भगवान महावीर की 2600वीं निर्वाण वर्ष में गठित चारों सम्प्रदाय के मुनियों की समिति में आपको प्रतिनिधित्व करने का अवसर मिला।
8. गुरु वल्लभ स्वर्गारोहण अर्धशताब्दी समारोह – सन 2004 का चातुर्मास दादई में किया, जहां गुरु वल्लभ की स्वर्गारोहण अर्धशती के उपलक्ष्य में भव्य आयोजन हुए। आपकी आज्ञा से गुरु इन्द्रदिन्न सूरीश्वर जी के कालधर्म पश्चात वल्लभ समुदाय की बागडोर आचार्य विजय नित्यानंद सूरीश्वरजी म.सा- को सौंपी गई।
9. ज्ञात इतिहास में गुरु आत्म जन्मभूमि - लेहरा (पंजाब) में सादगीपूर्वक चातुर्मास करने का श्रेय आपको जाता है। आपके संयम के प्रभाव से पूरे गांव ने तब शाकाहारी बनने का नियम लिया था। आज भी लेहरा के कई बुजुर्ग आपको याद करते हैं। आत्मारामजी, आनंदघनजी आदि अध्यात्मयोगियों के स्तवनों को भी आप सदा गुनगुनाया करते थे।
10. आत्म-ध्यान-साधना के उद्देश्य से अंतिम कई वर्ष आपने ओस्त्रा, ईडर आदि में व्यतीत किये। प्रेक्षाध्यान आदि कई ध्यानपद्धतियों की आपने अनुभूति की। सन् 2006 में संवत्सरी के अगले दिन आपका ईडर (गुजरात) में कालधर्म हुआ।
वल्लभ वाटिका ✍️

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