लुप्त होती वारली कलाकृति को पुनर्जीवित करने का भी है संकल्प
इनके जज्बे को है नमन..!
पेंटिंग्स के माध्यम से कोविड -19 के प्रति आदिवासी समाज को कर रही जागरूक
10 हजार वर्ष पुरानी संस्कृति को बचाने की जद्दोजहद
विनोद मिश्र / पालघर
"सामाजिक जिस्म के घावो का अब उपचार होना चाहिए ,सामाजिक जीवन की भयावह प्रवृत्तियों का प्रतिकार होना चाहिए ,नैतिक सेहत को अक्षुण्ण बनाये रखना आज की जरूरत है ,सामाजिक जीवन की खौफनाक विकृतियो का प्रतिकार होना चाहिए" किसी शायर द्वारा लिखित इस शायरी के एक एक शब्दों को पालघर की एक मां-बेटी साकार करने में जुटी हुई हैं। समाज के प्रति कुछ करने का इसी तरह का संकल्प लेकर कीर्ति वरठा और उनकी बेटी तन्वी तथा उसकी सहेली सुचिता कामडी आदिवासियों की हजारों वर्ष पुरानी कलाकृति के संवर्धन, महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण व रोजगार की दिशा में खुद को समर्पित कर दी हैं। इसके साथ ही आदिवासियों की अपनी मूल भाषा को दर्शाती वारली पेंटिंग्स के माध्यम से कोविड-19 के प्रति आदिवासी समाज मे फैली भ्रांतियों को तोड़कर कोविड के दिशा निर्देशों का पालन करने की जनजागरूकता भी कीर्ति वरठा कर रही हैं।
कोरोना को मानते हैं भूत बाधा, वैक्सीन से लगता है डर
कीर्ति वरठा ने को बताया कि वह मूल रूप से वारली आदिवासी समाज से आती हैं। उन्होंने वाणिज्य से स्नातक तक की शिक्षा ली है। उनके पति नीलेश रेलवे में मोटरमैन हैं तथा बेटी तन्वी बारहवीं की छात्रा है। वारली आदिवासी समाज के लोग पालघर जिले के जव्हार, मोखाडा, विक्रमगढ़, तलासरी, वाड़ा, डहाणू आदि क्षेत्र में बहुतायत में रहते हैं। कीर्ति ने देखा कि उनके समाज मे कोरोना महामारी को लेकर लोगों में कई भ्रांतियां हैं। इलाज के लिए लोग अस्पताल में जाने से डरते हैं, घरेलू उपचार या इसे वे भूत -प्रेत का बाधा मानकर तांत्रिकों के चक्कर मे पड़ कर अपनी जान गंवा रहे हैं। वैक्सीन लगाने के लिए स्वास्थ्यकर्मी जब उनके गांव में आते हैं तो लोग जंगलों में छुप जाते हैं। इन सब अफवाहों भ्रांतियों को दूर करने के लिए कीर्ति ने वारली भाषा को दर्शाती उनकी अपनी सांस्कृतिक पेंटिंग्स के माध्यम से जन जागरूकता का अभियान शुरू किया। करीब 200 पेंटिंग्स बनाकर व्हाट्सएप ग्रुप में संदेश भेजा। सभी से इसे ज्यादा से ज्यादा प्रसारित करने व अपना स्टेटस रखने डीपी रखने का आग्रह किया। इससे कोरोना के प्रति लोगों में जनजागरूकता के साथ साथ उनकी लुप्त होती वारली पेंटिग्स को पुनर्जीवित करने का प्रयास कीर्ति कर रही हैं। जिसमें उनके पति व बेटी तन्वी व सुचिता सहयोग कर रही हैं।
सवासीन व धवलेरी संस्कृति को पुनर्जीवित करने का प्रयास
41 वर्षीय कीर्ति वरठा आदिवासी एकता परिषद पालघर की राष्ट्रीय अध्यक्षा हैं, इसके अलावा आदिवासी श्रमिक महिला मंडल जैसे कई संस्थाओं से जुड़ कर आदिवासी महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण व रोजगार की दिशा में कार्यरत हैं। कीर्ति ने बताया कि करीब 10 हजार वर्ष पुरानी वारली पेंटिग्स की संस्कृति इधर करीब 50 वर्षों से धीरे धीरे लुप्त हो रही है। इन पेंटिग्स को जीवित रखने के लिए उनके पूर्वजों ने इसे शादी व्याह का एक अहम हिस्सा बना दिया था। प्रत्येक वारली आदिवासी की शादी में वारली पेंटिग्स बनाये जाने की प्रथा थी, जिसे आदिवासी महिलाएं ही बनाती थी, उन्हें सवासीन कहते थे, इस कार्य के लिए उन्हें पारिश्रमिक भी दी जाती थी। इतना ही नही तो जहां अन्य समाजों में विधवा महिलाओं को अपशकुन की दृष्टि से देखा जाता है। वहीं वारली आदिवासी समाज मे उन्हें सम्मान देने के लिए शादी व्याह की रश्में विधवा महिलाओं से ही कराई जाती थी। जिन्हें धवलेरी कहा जाता था।जिसका उन्हें भी पारिश्रमिक देकर आर्थिक संबल दिया जाता था। आज इनकी जगह पंडित, पादरी, पुरोहितों ने ले ली है। वारली पेंटिग्स के माध्यम से कीर्ति वरठा न केवल कोविड -19 के प्रति जनजागरूकता बल्कि इसके माध्यम से अपनी पुरानी संस्कृति सभ्यता सवासीन व धवलेरी को उनका खोया सम्मान दिलाने की दिशा में भी कार्य कर रही हैं। इसके लिए उन्होंने अधिक से अधिक आदिवासी महिलाओं को वारली पेंटिग्स की कला में पारंगत करने के लिए अपने स्वख़र्च से क्लासेस की भी शुरुआत की है।



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