‘भारतनामा: भारत का नामकरण’ पर राष्ट्रीय स्तर का विमर्श संपन्न

भारत’ नाम की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को समझने की दिशा में प्रेरक पहल है।


भोपाल :- ‘
भारत’ नाम की उत्पत्ति,ऋषभदेव आदिनाथ  पुत्र भरत के नाम पर हुई थी, उसके वैदिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक आधारों पर केंद्रित एक महत्वपूर्ण अकादमिक विमर्श सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। यह कार्यक्रम इंडियन रिसर्च स्कॉलर्स एसोसिएशन (IRSA) के तत्वावधान में गूगल मीट के माध्यम से आयोजित किया गया, जिसमें देशभर के शिक्षाविद्, शोधार्थी एवं विद्वान शामिल हुए।

आभासी कार्यक्रम में सम्मिलित जैन  गजट के सह संपादक राजेंद्र जैन महावीर सनावद ने बताया कि विमर्श का केंद्र रही चर्चित लेखिका डॉ. प्रभाकिरण जैन की शोधपरक कृति भारतनामा: भारत का नामकरण, जिसमें ‘भारत’ नाम की उत्पत्ति से जुड़े प्राचीन ग्रंथों, पुरातात्विक प्रमाणों और ऐतिहासिक मतों का गहन विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि के रूप में केंद्रीय विश्वविद्यालय पंजाब के कुलपति प्रो. जगबीर सिंह ने अपने उद्बोधन में कहा कि “राष्ट्र के नामकरण पर गंभीर शास्त्रीय विमर्श समय की आवश्यकता है, और यह पुस्तक उस दिशा में एक सार्थक एवं प्रामाणिक प्रयास है।”

विशिष्ट अतिथि के रूप में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. प्रकाशमणि त्रिपाठी ने पुस्तक को भारतीय इतिहास लेखन की दृष्टि से अत्यंत उपयोगी बताते हुए इसे शोधार्थियों के लिए मार्गदर्शक ग्रंथ बताते हुए बृहस्पति आगम, विष्णु पुराण, आदि पुराण, महाभारत, रामायण आदि ग्रंथ का उल्लेख करते हुए कहा कि डॉक्टर प्रभात किरण जैन द्वारा लिखित पुस्तक भारत नामा भारतीय ज्ञान परंपरा के ज्ञान प्रवाह में महत्वपूर्ण योगदान है। डाॅ त्रिपाठी ने इस तथ्य की प्रामाणिकता का उल्लेख करते हुए कहा कि हमारे देश का नामकरण "भारत" आदि ऋषभदेव के पुत्र भरत के नाम पर ही हुआ है । अन्य भरत के नाम पर नामकरण के प्रमाण नहीं हैं।

कार्यक्रम की अध्यक्षता दयाल सिंह कॉलेज की प्राचार्या प्रो. भावना पाण्डेय ने की। उन्होंने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि इस प्रकार के विमर्श न केवल अकादमिक चेतना को प्रखर करते हैं, बल्कि राष्ट्र की सांस्कृतिक अस्मिता पर सार्थक संवाद को भी आगे बढ़ाते हैं।भारत नामा में उत्प्रेरणा,  उत्प्रेरक,उद्देश्य तीनों कारक मौजूद हैं।

लेखिका डॉ. प्रभाकिरण जैन ने पुस्तक परिचय प्रस्तुत करते हुए स्पष्ट किया कि ‘भारत’ नाम केवल एक भौगोलिक पहचान नहीं, बल्कि एक दीर्घ सांस्कृतिक परंपरा और वैचारिक धारा का प्रतीक है। उन्होंने बताया कि पुस्तक में वैदिक साहित्य, पुराणों, जैन एवं बौद्ध स्रोतों सहित विभिन्न ऐतिहासिक साक्ष्यों का तुलनात्मक अध्ययन किया गया है।

कार्यक्रम का संयोजन डॉ. विकास कुमार ने किया, जबकि सह-संयोजक डॉ. हेमंत कुमार (जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय) एवं सचिव डॉ. लोकपा तामांग (राजीव गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय) थे।संचालन शुभांगी ने किया। शोधार्थी श्रद्धा सहित अनेक जनों  ने प्रश्न किए।

अंत में आयोजित प्रश्नोत्तर सत्र में प्रतिभागियों ने जिज्ञासापूर्वक अपने प्रश्न रखे, जिनका विद्वानों ने तथ्यपूर्ण उत्तर दिया। डा विकास के आभार प्रदर्शन के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ। प्रतिभागियों में विभिन्न विश्वविद्यालयों के कुलपतियों, आचार्यों तथा शोधार्थियों ने शिरकत की। यह विमर्श ‘भारत’ नाम की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को समझने की दिशा में एक महत्वपूर्ण और प्रेरक पहल है।

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