संल्लेखना पूर्वक मुनि विश्वयश सागर महाराज की शिखरजी तीर्थ में समाधि

 10 दिनों से अन्न जल त्याग दिया था 

गिरिडीह (मधुबन):-परम पूज्य  मुनि विश्वयश सागर महाराज की शिखरजी तीर्थ में  समाधि सलेंखना पूर्वक हुई।वे सम्मेद शिखरजी  मधुबन के 13 पंथी कोठी में बिराजमान थे। उन्होंने बुधवार को दोपहर सवा बारह बजे अंतिम सांस ली। ।

इसे साधना संथारा व  सल्लेखना भी कहते हैं। पिछले नौ दिनों से उन्होंने जल तक त्याग दिया था। आचार्य श्री के साथ करीब 30 साधु चातुर्मास कर रहे थे।श्रद्धालु भी उनका दर्शन कर खुद को धन्य महसूस कर रहे थे।आप  आचार्य श्री विराग सागर जी महाराज के शिष्य थे। उनके साथ करीब तीन साल पूर्व वह मधुबन पहुंचे थे। तब से वह यहीं थे। उन्होंने सम्मेद शिखरजी में ही सल्लेखना करने का निर्णय लिया था।अंतिम संस्कार इसी शास्वत भूमि पर किया गया। 

 एक परिचय 

उनका सांसारिक नाम प्रेमचंद आजाद जैन था। उनका जन्म पांच जनवरी 1940 को हुआ था। उनके पिता  वीरनलाल जैन थे। वह मूलत: मध्य प्रदेश के जबलपुर के रहने वाले थे।

अन्न - जल का त्याग कर लिया जाता है सल्लेखना मे दिगंबर जैन साधु के पैरों पर खड़े होकर खाने व पीने की ताकत रहती है, तभी तक भोजन करते हैं और पानी पीते हैं। साधु बनते वक्त ही संकल्प लेते हैं कि जब तक पैरों पर खड़े होने की ताकत रहेगी, तभी तक वह भोजन व जल ग्रहण करेंगे। अधिक उम्र होने के कारण जिस दिन से पैरों पर खड़ा होने की ताकत खत्म हो जाती है। जीवन का अंत नजदीक नजर आने लगता है, उसी दिन से अन्न व जल त्याग देते हैं। इसे साधु अपने जीवन की अंतिम साधना करते हैं, जिसे सल्लेखना या संथारा कहते हैं। सल्लेखना का समापन साधु के शरीर त्यागने से होता है। समाधि के पश्चात डोला यात्रा (अंतिम यात्रा) निकालकर पारंपरिक तरीके से अंतिम क्रिया सम्पन्न की जाती है।

उपरोक्त जानकारी प्रवीण जैन (पटना)राज कुमार अजमेरा व नवीन जैन ने दी। 

अभिषेक जैन लुहाड़िया / रामगंजमडी

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