सादडी के गौरव गुरु-चरण-सेवी, सरल-स्वभावी एवं धर्म-प्रचारक आचार्य श्री न्याय सूरीश्वरजी
पंजाब केसरी विजय वल्लभ समुदाय के यशस्वी संत श्री न्याय सूरीश्वरजी म. सा.
जीवन-चरित्र
पंजाब देशोद्धारक न्यायाम्भो-निधि आचार्य महाराज श्री १००८ विजयानंद सूरीश्वरजी (आत्मारामजी म. सा. ) के पट्टधर भारत-दिवाकर, अज्ञान तिमिर तरणि, कलिकाल कल्पतरु पंजाब केशरी युगवीर आचार्य महाराज श्री १००८ विजय वल्लभ सूरीश्वरजी महाराज सा. के पट्टधंर शान्तमूर्ति, आचार्य महाराज श्री १००८ विजय संमुद्र सूरीश्वरजी म.सा. के अद्वितीय पट्टधर, अनुयोगाचार्य, पल्लीवाल मूर्ति पूजक जैन श्वेताम्बर उद्बोधक व अनेक प्रतिष्ठा उपधान के संयोजक, आजीवन गुरु-चरण-सेवी, सरल-स्वभावी, धर्म-प्रचारक आचार्य श्री न्याय सूरीश्वरजी म. सा.वल्लभ समुदाय ही नही जिनशासन की शान थे।साधु जीवन के नियमों का कड़ाई से पालन करने की वजह से उन्हें अनुयायी कठोर भी समझते थे।
पूज्य गुरुदेव का जीवन गुरु-भक्ति, गुरु सेवा एवं वीतराग प्रभु के धर्म की प्रभावना हेतु किये गये कार्यों से ओत-प्रोत जीवन के अंतिम समय तक रहा। आपने अपने चित्र अथवा जीवन-चरित्र के प्रकाशन की कभी आकांक्षा नहीं की। लेकिन आपकी प्रतिभा, गुरु महाराज से ली हुई दीक्षा, उसके प्रति रात-दिन की तपस्या, सेवा, स्वभाव की सरलता, मधुरता एवं धर्म के प्रति प्रगाढ़ आस्था, धर्म के प्रचारक महाराज सा. के संबंध में दो शब्द हम लिखें यह हमारा परम कर्त्तव्य व सौभाग्य है।
आचार्य गुरुदेव विजय समुद्र सूरीश्वरजी के द्वारा किये गये धार्मिक क्रिया-कार्यक्रम, प्रतिष्ठा, उपधान एवं साधु-साध्वी के योगोद्धहनादि अनुष्ठानों में रथ के सारथी की तरह आप कर्त्तव्यनिष्ठ रहे। आप अनन्य गुरु-भक्त, गुरु म.सा. के प्रति विनय भाव एवं धार्मिक कार्यों में बिना किसी यश की इच्छा के अपने संकल्पों में सक्रियता से संलग्न रहने वाले थे।
जन्म एवं संस्कार :
आपका जन्म महान व विष्व विख्यात श्री राणकपुर तीर्थ से 10 कि. मी. दूर गोड़वाड की मुख्य नगरी सादड़ी शहर में देवीचंदजी नवलाजी परिवार में माता जतनोबाई की कुक्षी से संवत् १९७८ में मूर्ति पूजक औसवाल वंश में बंबोरी-गौत्र के संपन्न परिवार में हुआ। आपके पिता भद्रिक एवं परोपकार रसिक श्रावक तथा माताजी देय गुरुभक्ति में श्रद्धावान परम श्राधिका थी । माता-पिता ने आपका नाम रतनचन्द रखा। आपको त्याग, तपस्या और धार्मिक-रुचिअपने परिवार से सुसंस्कृत रूप में मिली। आपका सम्पूर्ण परिवार परम्परा से धार्मिक कार्यों में विश्वास रखता हैं। जिस परिवार में परम्परा से धार्मिक रुचि रही हो उस परिवार का कोई भी व्यक्ति उन संस्कारों से वंचित केंसे रह सकता है ? आपको परम्परा से प्राप्त संस्कार जीवन में आगे चलकर विकसित हुवे जिसका लाभ आज भी सारे समाज को मिल रहा है। सारांश यह है कि म. सा. का आज का रूप उनको परिवार से प्राप्त धार्मिक संस्कारों का ही प्रतिफल है।
शिक्षा एवं दिनचर्या :
आपकी शिक्षा आत्मानंद जैन पाठशाला सादड़ी, वरकाणा पार्श्वनाथ जैन विद्यालय एवं मुंबई के मारवाड़ी विद्यालय में संपन्न हुई। आपकी दिनचर्या में जिनेश्वर-देव की पूजा, स्नात्र पूजा, प्रतिक्रमण, तपश्चर्या, गुरु सेया एवं दान आदि मांगलिक कार्य मुख्य रूप से चलते रहे। बचपन से ही आपका स्वभाव सरल, द्या-युक्त एवं धर्म के प्रति आस्थावान था।
विवाह एवं स्वास्थ्य :
युवावस्था में आपके माता-पिता ने आंपकी सगाई निश्चित करदी थी। कुछ दिन पश्चात् अचानक आपका स्वास्थ्य बिगड़ गया । अस्वस्थ्य शरीर और स्वस्थ्य हृदय में एक लहर उठी कि विवाह को त्याग दू और स्वस्थ्य होते ही धर्म-दीक्षा अंगीकारं करू । जो विचार हृदय में उठा था उसको पूर्ण करने में शरीर ने साथ दिया। प्रबल पुण्योदय के प्रभाव से आप शीघ्र ही निरोगी हो गये। उन्हीं दिनों आचार्य देव पंजाब केशरी विजय वल्लभ सूरीश्वरजी म.सा. अपने शिष्यों के साथ गोड़वाड़ सादड़ी शहर में पधारे ओर चातुर्मास तय हुआ। आचार्यश्री के आगमन से आपके हृदय सागर की लहर को किनारा मिला। जगत की असत्यता, कर्म रूपी रोग को सदा के लिये नष्ट करने की भावना प्रबल हुई। ऐसे अपूर्व अवसर पर जिनेश्वर देव की प्रवज्या अंगीकार करने का आपने संकल्प लिया। संकल्प अपनी राह स्वयं खोज लेता है। इस प्रकार सागर की लहर, लहर को किनारा, किनारे को आचार्यजी का सहारा मिलने पर आपके संकल्प को पूरा करने के लिये आपके माता-पिता ने दीक्षा लेने के लिये आज्ञा प्रदान की।
दीक्षा :
आपने 28 वर्ष की उम्र में भारत दिवाकर, आचार्य श्री १००८ श्री विजय वल्लभ सूरीश्वरजी के सानिध्य में आपके पट्टधर शान्तमूर्ति आचार्य श्री समुद्र सूरीश्वरजी म.सा.के कर कमलों से संवत २००६ मगसर सुंदी १० को श्री राता महावीर स्वामी तीर्थ से ३ मील दूर बीजापुर-नगर (राजस्थान) में दो मित्रों के साथ दौक्षा ग्रहण की। इस दीक्षा-महोत्सव में अनेक नगरों से आये लगभग 10 हजार जैन श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित थे । भगवान मूलनायक संभवनाथजी के मन्दिर की प्रतिष्ठा एवं दीक्षा महोत्सब दोनों ही संपन्न हुवे ।
गणिपद एवं पन्यासपद :
आपको गणिपद बिकानेर उपधान के माला के अवसर पर बीस हजार जैन व अनेक संघों की उपस्थिति में प्रदान किया।वरली में भगवान सुविधिनाथजी के मन्दिर के प्रतिष्ठा दौरान 6/11 को पन्यास-पद प्रदान किया गया, जिसमे 20 हजार से ज्यादा लोग उपस्थित थे।आपके इन्हीं कार्यों को देखते हुए शेत्रुंजय सम ठाणे तीर्थ में भगवान मुनिसुव्रत भगवान के सानिध्य में आचार्य पदवी प्रदान की गई।
आचार्य श्री के साथ शासन हेतु किये मुख्य-कार्य :
शान्तमूर्ति श्री १००८ आचार्य श्री समुद्र सूरीश्वरजी महाराज सा० के साथ मुख्य कार्यों में दिये गये सहयोग की सूचीः-
(१) गुजरात झगड़िया आदिश्वरंजी मंदिर के ध्वजाण्ड आरोहण एवं आत्मानन्द जैन गुरुकुल में गुरु मंदिर की प्रतिष्ठा में सक्रिय सहयोग आपने दिया ।
(२) झनोर ग्राम में भगवान मुनिसुव्रत स्वामी के मन्दिर की प्रतिष्ठा में साथ रहे ।
(३) बोड़ोली शहर में श्री महावीर स्वामी के मंदिर की प्रतिष्ठा महोत्सव में साथ रहे ।
(४) अणहिलपुर पाटण में मुख्य पंचासरा पार्श्वनाथ के मंदिर की एवं आदिश्वर भगवान के मंदिर, शान्तिनाथ भगवान के मन्दिर, पार्श्वनाथ भगवान का एवं दूसरे शांतिनाथ भगवान के मन्दिर इस प्रकार पाटण के कुल ५ मंदिरों की प्रतिष्ठा-महोत्सव मे साथ सक्रिय रहे ।
(५) नाड़ोल (राज.) में मुख्य पद्म प्रभु भगवान के मन्दिर की एवं नेमीनाथ भगवान आदि के पाँच मन्दिरों की प्रतिष्ठा में साथ रहे।
(६) सादड़ी (राज.) आत्मानन्द जैन पाठशाला आदिश्वर जी के मन्दिर की प्रतिष्ठा में साथ रहे ।
(७) भरतपुर शहर (राज.) में मुनिसुव्रत स्वामी के मंदिर की प्रतिष्ठा में साथ रहे ।
(८) वरकाणा गोड़वाड़ (राज.) पाइर्धनाथ भगवान के मंदिर की प्रतिष्ठा में' सहयोग दिया ।
(९) बीजोवा (राज.) श्री चिन्तामणि पार्श्वनाथ भगवान के मंदिर की प्रतिष्ठा में साथ रहे ।
(१०) आना-ग्राम (राज.) श्री शान्तिनाथ भगवान के मंदिर की प्रतिष्ठा में साथ रहे।
(११) सौराष्ट्र पालीताणा वल्लभ विहार में पार्श्वनाथ मंदिर व गुरु मंदिर की प्रतिष्ठा में साथ रहे ।
(१२) पालीताणा में ही आदिश्वर भगवान की टूक में गुरु-देवजी की मूर्ति की दो बार प्रतिष्ठा में साथ रहे ।
(१३) बरकाणा (राज.) में गुरु मन्दिर की प्रतिष्ठा में पूर्ण सहयोग दिया ।
(१४) मुंबई वरली (महाराष्ट्र) में सुविधिनाथजी के मंदिरजी की प्रतिष्ठा में साथ रहे ।
(१५) ठाणा-शहर (महाराष्ट्र) में गुरुदेवजी की मूर्ति मुनिसुव्रत-स्वामीजी के मदिर में प्रतिष्ठित कराई ।
(१६) पूना शहरे (महाराष्ट्र) में गौड़ी पार्श्वनाथ भगवान के मन्दिर में गुरुदेवजी की मूर्ति की प्रतिष्ठा में पूर्ण सक्रिय रहे।
(१७) हरजी (राज.) में महावीर स्वामी मंगवान की प्रतिष्ठा में सहयोग दिया एवं सक्रिय रहे।
आचार्य गुरुदेव विजय समुद्र सूरीश्वरजी की आज्ञा से न्याय सूरीश्वरजी म.सा. द्वारा सम्पन्न कराये गये कार्यों की सूची :
(१) द्यांलपुर (राज.) श्री शीतलनाथजी मंदिर की प्रतिष्ठां सम्पन्न कराई।
(२) कोपरग्राम (महा.) में श्री मुनिसुव्रत स्वामीजी के मंदिर की प्रतिष्ठा कराई ।
(३) शिवगंज शहर (राज) में श्री औसवाल जैन संघ के द्वारा आपके उपदेश से सवालाख रुपये से चांदी का रथ एवं इन्द्रध्वजॉ बनाई गई ।
(४) अलवर (राज.) में पार्श्वनाथ भवन आपके उपदेश से निर्मित हुआ ।
(५) पूना (महा.) में आचार्य म. सां. श्री विजय वल्लभ सूरीश्वरजी के नाम से हायस्कूल प्रारम्भ कराया। जिसमें चन्दे के रूप में श्वेताम्बर जैन मूर्ति-पूजक संघ से सहयोग लेकर लेकर प्रारंम्भिक राशि ५ हजार रुपये प्रति सदस्य के नाम से एकत्रित कराया ।
(६) मुंबई और पूना में आचार्य महाराज सा. विजयवल्लभं सूरीश्वरजी की शताब्दी समारोहूं मनाने के लिये धनराशि एकत्रित करने हेतु आप पूर्ण रूप से जूटे रहे एवं राशि एकत्रित कराई ।
(७) महावीरजी स्टेशन पर पष्टोंदा ग्राम में महावीरस्वामीजी के नूतन मन्दिर के निर्माण के लिये द्रष्य एकत्रित कराने में' सक्रिय रहे व सहयोग दिया । पल्लीवाल जैन श्वेताम्बर के ३१ ग्रामों में सक्रिय धर्म प्रचार किया ।
(८) साडी शहर (राज.) बीकानेर, वेडानगर (राज.) आदि में उपधान तप की आराधना करवाई एवं अनेक अट्टाई-महोत्सव तथा कई साधु-साध्वीजी को योगोद्वहन आदि कराये ।
उग्र-विहार :
(१) आपने गुरुदेव के साथ १८ मील से लेकर २८ मील त्तक प्रतिदिन उग्र-विहार किया। बड़े गुरुदेवजी के स्वास्थ्य खराब होने की सूचना मिलते ही तत्काल बोरसद से आप गुरुदेव के चरणों में घाटकोपर पहुँचे ।
(२) गुजरात पाटन से १२५ मील की दूरी पर वरकाणा विद्यालय में गुरु मन्दिर की प्रतिष्ठा पर आचार्य गुरुदेव विजय-समुद्र सूरीश्वरजी के साथ आप पोष की कडकडाती ठण्ड में २८ से ३२ मील प्रतिदिन उद्यविहार कर चरकाणा गुरु मन्दिर की प्रतिष्ठा में पधारे ।
धन्य है न्यायसूरीश्वरजी म.ज सा. की गुरुभक्ति कि ऐसे कठिन उग्र विहार करके गुरुदेवजी के प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट की एवं कभी पीछे नहीं हढे ।
मध्य-प्रदेश के मन्दसौर जिले की भानपुरा तहसील में भगवान पार्श्वनाथ के बड़े जिनालय का ध्वजादण्ड आरोहण वर्षों से नहीं हो पारहा था। आपके सानिध्य में दिनांक ५ फरवरी १९७३ को मन्दिरजी का ध्वजारोहण समारोह धूमधाम से सम्पन्न हुआ । आपकी उपस्थिति से अट्टाई-महोत्सव हुवा जिसमें व्याख्यान, तप पूजा, नवपदपूजा, शांतिस्नात्रपूजा आदि धार्मिक कार्यक्रम सम्पन्न हुवे ।
शासन सेवा :
मन्द्रिजी, उपाश्रय, पाठशाला, जीवदया एवं अन्य धार्मिक कार्यक्रमों को आपने पूर्ण करवाया एवं सहायता तथा मार्गदर्शन प्रदान किया । "आपका जीवन धर्म है अथवा धर्म आपका जीवन है।" निर्णय करना कठिन है।
आगर (म. प्र.)
पारसचन्द सकलेचा प्रिंसीपाल
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