सिल्वर इनिंग NGO की सफलता के 18 साल
डिमेंशिया के शिकार वृद्धों की कर रहे मदद बुजुर्गों की जिंदगी में खुशियों की मुस्कान देते शैलेश
भाईंदर :- वृद्धावस्था में कई तरह की स्वास्थ्य समस्याएं लोगों को घेर लेती है। ऐसी स्थिति में बुजुगों की सेवा करना जरूरी हो जाता है। अपनी गाददाश्त खोने से परेशान नुजुर्गो को भी बहुत मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। ऐसे बुजुर्गों की मदद कर उनकी जिंदगी में उत्साह भर रहे है शैलेश मिश्रा। शैलेश स्वतंत्रता सेनानी के पोते और एक समाज सेवक के बेटे हैं। यह सिल्वर इन्गि नामक एनजीओ के माध्यम से ओल्ड ऐज एडसोकेसी और डिमेंशिया केंद्र शुरू कर न केवल वुजुगों की सेवा कर रहे हैं, उनकी जिंदगी में नां उमग भरने का भी काम कर रहे है।
शैलेश ने पिछले 16 वर्षों में ओल्ड एज एडवोकेसी और डिमेंशिया केंद्र से ऐसा काम कर दिखाया है कि महानायक अमिताभ बच्चन और सुपरस्टार आमिर खान भी अपने-अपने कार्यक्रमों में उनकी तारीफ कर चुके हैं। उनके काम के लिए उन्हें न केवल राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर बरिक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सम्मानित किया जा चुका है। संयुक्त राष्ट्र में शैलेश भारत का प्रतिनिधित्व भी कर चुके हैं। अभी हाल भी 'कॉमन मेल्थ' की एक पत्रिका में शैलेश की तस्वीर 'कवर पेज' पर छपी है और ओल्ड एज एडवोकेसी' और 'डिमेशिया' उनके आर्टिकल को प्रमुखता से छापा गया है।
जीत ले जहान
डिमेंशिया के मरीजों के लिए एक नई उम्मीद का घर
शैलेश के दाद एक स्वतंत्रता सेनानी और पिता ग्रामसेवक थे। समाजसेवक उनके खून में है। वर्ष 2006 में अच्छी खासी कॉरपोरेट की नौकरी को छोड़कर शैलेश ने सिल्वर इनिग नानक नामक संस्था शुरू की थी। जनजागृति से शुरू कर वर्ष 2013 में उन्होंने ए- स्नेांजली नमक ओल्ड एज एडवेकेन्सी और डिमेशिया केंद्र की शुरुआत की। आम लोगों को देखने में यह एक वृद्धाश्रम लग सकता है, लेकिन करता में यह हिनेशिया के मरीजों के लिए एक नई उम्मीद का घर है। इस केंद्र में डिमेशिया के मरीजों की देखभाल डांस, म्यूजिक, योग थेरेपी के माध्यम से की जाती है। शैलेश कहते हैं कि ये काम आसान नहीं है। अभी हमें लंबा रास्ता उप करना है।
'ओल्ड एज एडवोकेसी समय की मांग'
शैलेश मिश्रा कहते है कि ओल्ड एज एडवेकेसी समय की मांग है। आज समाज में बच्चों और महिलाओं पर काम हो राप है, लेकिन बुढ़ापे पर किरने का प्यान नहीं है। एक आंकड़े के मुताबिक भारत में 11% आबदी यानी लगभग 14 करोड़ बुजुर्ग है और उनमें से 10% यानी लगभग 1.4 करोड़ लोग डिमेंशिया के शिकार है। बुजुर्गों में डिमेंशिया मूलने की अवस्था को कहा जाता है। शैलेश मिश्रा कहते है डिमेशिया पर जनजागृति बहुत जरूरी है। इस पर बहुत ही संवेदनशीलता के साथ काम करने की जरूरत है।शैलेश मिश्रा बुजुर्गों के साथ वक्त बिताकर उनका अकेलापन दूर करते हैं।
युवा पीढ़ी से हैं उम्मीदें
शैलेश कहते हैं कि उन्हें युवा पीढ़ी से बहुत उम्मीद है। इसलिए स्कूल-कॉलेज में जाकर सिल्वर इनिग की ओर से ओल्ड ऐज एडवोकेन्सी पर जनजागृति का काम किया जा रहा है। ताकि हम ऐसे युवा तैयार कर सके, जो बुढ़ापे का ख्याल रख सके। सरकारों को भी इस पर काम करने की जरूरत है। आज शैलेश के प्रयारों से ओल्ड एज एडकेकेसी और डिमेशिया जैसे विषय राजनैतिक पार्टियों के घोषणापत्र में शामिल हो चुके है। बुजुर्ग को मेडिक्लेम और पेशन का मूलभूत अधिकार होना चाहिए।

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