आचार्य विद्यासागरजी इस धरा पर भक्तों के भगवान है

गुरुदेव की शिक्षाएं जीवन में अपनाई तो हर समस्या का समाधान भी है

देवेंद्र ब्रह्मचारी

गवान महावीर की परंपरा अनुसरण करते हुए ब्रम्हांड के देवता आचार्य प्रवर शांतिदूत परम पूज्य आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महामुनिराज इसी मार्ग पर चलते हुए अपनी 56 वर्षों की कठिन साधना से सुशोभित गुरुवर की सोच कितनी वृहद रही है जिसमें उन्होंने जीव मात्र के कल्याण के लिए अपनी तपचर्या और संकल्प से अद्भुत कार्य किये, चाहे वह गौशालाओ की स्थापना का कार्य हो या फिर पूर्णायु आयुर्वेदिक प्रयोग हो, चाहे वह शिक्षा के क्षेत्र हो या फिर हथकरघा के माध्यम से लाखों लोगों का रोजगार देने का अवसर, *भारत की गौरवशाली सांस्कृतिक विरासत की पुनर्स्थापना* के लिए उनका योगदान अनन्य और अतुल्य है। 

रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई

जैसे गए आप  ऐसे भी जाते नहीं कोई

इक बार तो ख़ुद मौत भी घबरा गई होगी

यूं मौत को सीने से लगाता नहीं कोई

हम धन्य है जिस देश में महान तपस्वियों और तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी जैसे अवतारों ने जन्म लेकर इस धरा को पावन किया है। ऐसे महान संत को उनके संलेखना पूर्वक समाधि पर उन्हें बारम्बार नमन करता 

हूं। -

जैन धर्म के मूल सिद्धांत को अपने जीवन मे उतारते हुए हमने ने महज 13 वर्ष की उम्र में पूज्य आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज से ब्रम्हचर्य व्रत लिया और अपना पूरा जीवन उनकी शिक्षाओं को केवल जैन धर्म तक सीमित नहीं बल्कि पूरे विश्व में फैलने का संकल्प लिया, पिछले दो दशकों से लगातार देश एवम समाज के सभी वर्गों में सद्भावना, एक दूसरे के प्रति सम्मान और सर्वधर्म सदभाव के लिए अथक एवम अनवरत प्रयास कर रहा हूँ।

सामाजिक कार्यक्रम के माध्यम से जैन धर्म के 24 तीर्थंकर के बताए सिद्धान्त *जिओ और जीने दो* और *क्षमा वीरस्य भूषणम* से शांति को सही रूप में स्थापित किया जा सकता है। यह एक ही संदेश समस्त मानवता के लिए उत्तम उपहार है जिसके मानस पटल पर अंकित होने के बाद में जीवन पर्यंत व्यक्ति, कुदृष्टि एवम कुविचार से अपने को मुक्त कर सकता है। यही एक संदेश पूरे राष्ट्र को एक सूत्र में बांधने के लिए पर्याप्त है ,जरूरत है दृढ़- संकल्प लेकर अनवरत प्रयास का और मैं इस सिद्धांत विश्व मे जन जन तक पहुंचाऊंगा जिससे विश्व मे शांति स्थापित करने में मदद प्राप्त होगी


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