अंतरीक्षजी तीर्थ रक्षिका के रूप में जानी जाएगी साध्वी सुमतीश्रीजी
जिनशासन का पहला नाद किया था गुरूवर्या ने
दीपक जैन
जब समग्र जैन संघ अंतरीक्षजी की परिस्थिति से अज्ञात था तब लगभग चार वर्ष से आप यहाँ कार्य कर रहे थे। बालापुर, खामगांव, मलकापुर, शेगाम, अकोला और आसपास के गाँवों की श्राविकाओं में प्रगट किया शौर्य, खमीर और जोश तो अद्भूत है। इसीलिए आपको सताने में, डराने में, अपशब्द बोलने में कोई कसर बाकी नहीं रखी।
अंतरीक्ष पार्श्वप्रभु के गंभारे में ही आपको लहुलूहान कर दिया गया था। आपके लिए निम्न स्तर की गालियां भी बोली गई थी और चोरी के बिलकुल मिथ्या आक्षेप भी आप पर लगाये गये थे। इनसे भी संतोष नहीं हुआ तो हथियारों के साथ हमला आप जैसे निशस्त्र और क्षमावान साध्वीजी पर दिनांक 10 मई को किया गया था।फिर भी आपने मन में किसी के प्रति लेशमात्र द्वेष उत्पन्न नहीं किया। आपने द्वेष करनेवालों का कल्याण ही चाहा है।
पूज्य चंद्रशेखर विजयजी म.सा. जब अंतरीक्षजी में तीर्थरक्षा का दायित्व निभा रहे थे तब अकोला जैसे करीबी विराट क्षेत्र की जागृति का दायित्व वहां चातुर्मास करके आपने निभाया था। आपश्री जैसे साध्वीजी प्राप्त होने से जैन संघ गौरव का अनुभव कर रहा है। शौर्य और क्षमा की आपकी तेजस्वीता को हम किन शब्दों में लिख सकते है ?
वर्तमान समय में भी पूज्य साध्वीजी भगवंत स्वयं के संयमजीवन की आराधना के साथ-साथ शासन प्रभावना, शासन सुरक्षा, तीर्थ सुरक्षा और जैनत्व जागरण के लक्ष्य के साथ गुजरात-मुंबई के सिवाय प्रांतीय प्रदेश के एक-एक जिल्ले के अवग्रह को कायमी रुप से स्वीकार ले तो सामान्य साध्वीजी भगवंत भी एक आचार्य के समान प्रभावक बन सकते है।

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