अपने ही गुणों पर ध्यान केंद्रित करें :- संत बालकदास

पाटेश्वर धाम में प्रतिदिन ऑनलाइन सत्संग

आनंदमय और सुखमय अद्भुत ऑनलाइन सत्संग का आयोजन पाटेश्वर धाम के संत राम बालक दास जी द्वारा प्रतिदिन अपने सीता रसोई संचालन ग्रुप में प्रातः 10:00 से 11:00 बजे और दोपहर 1:00 से 2:00 बजे किया जाता है जिसमें सभी भक्त जुड़कर अपनी जिज्ञासाओं का समाधान प्राप्त करते हैं

 सत्संग परिचर्चा में दाताराम साहू रायपुर ने पूछा कि वर्ष में चार महारात्रीया होती हैं ?

पहला मोह रात्रि अर्थात जन्माष्टमी,दूसरा कालरात्रि अर्थात नरक चतुर्दशी,तीसरा दारुण रात्रि अर्थात होली एवं और चौथी अहो रात्रि अर्थात शिवरात्रि इसपर बाबाजी ने बताया कि, हमारे हिंदू धर्म में चार ऐसे पर्व है जिनका महत्व रात्रि में है, कृष्ण जन्माष्टमी को रात के 12:00 बजे पूर्णता भजन कीर्तन ढोल नगाड़ों के साथ श्री कृष्ण के आगमन के उत्सव में पूर्ण हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है, उसी प्रकार नरक चतुर्दशी की रात्रि का महत्व है इस दिन माता लक्ष्मी की सभी रूपों को विभिन्न विधि विधान से पूजन किया जाता है एवं विभिन्न तांत्रिक विधियां भी की जाती है एवं पूरी रात्रि माता की उपासना स्तवन,जप,तप उन्हें प्रसन्न करने के लिए पूजा की जाती है.वैसे ही शिवरात्रि महापर्व है. जिसमें माता पार्वती और भोले भंडारी के विवाह  उत्सव को पूरी रात्रि भजन कीर्तन के साथ मनाया जाता है.इसी तरह की होलिका दहन की रात्रि भी महत्वपूर्ण होती है परंतु कोई भी रात्रि कालरात्रि या दारुन रात्रि नहीं होती, यह तो भगवान की लीलाओं का पर्व होता है. इन महत्वपूर्ण चारों रात्रियों को केवल भगवान की उपासना उनके भजन कीर्तन उनके उत्सव के रूप में मनाया जाता है जिसमें भगवान के भजन कीर्तन से हम स्वयं सुखमय एवं आनंदमय भावों को अनुभव करते हैं एवं रात्रि में जागरण करके उनको भी प्रसन्न  करने हेतु जप  तप  धूप दीप नैवेद्य के द्वारा उपासना करते हैं.

         सत्संग परिचर्चा को आगे बढ़ाते हुए पुरुषोत्तम अग्रवाल थानखमहरिया ने धन गया तो थोड़ा गया. स्वास्थ्य गया तो कुछ अधिक गया लेकिन चरित्र गया तो सब कुछ गया इस कहावत के भाव को स्पष्ट करने की विनंती की.

इस  लोक  व्यवहारिक वाक्य को स्पष्ट करते हुए बालकदास जी ने कहा कि, मनुष्य धन  तो कमा सकता है, लेकिन चरित्र को कमाया नहीं जा सकता उसे बनाया जाता है. चरित्र का निर्माण आपके कर्मों का परिणाम होता है धन को मनुष्य अपने कला के द्वारा अपने बुद्धि विवेक के द्वारा कमा सकता है. धन की गरीबी को दूर कर सकते हैं और स्वास्थ्य का रक्षण भी आपके हाथों में है. आप अपनी दिनचर्या को ऐसा रखें कि स्वास्थ्य बना रहे. उन्होंने बताया कि भगवत भक्ति में लगे लेकिन चरित्र ऐसा संपदा या ऐसी विशेषता है जिसको हम सदैव रक्षण ही कर सकते हैं. इस पर कभी कोई दाग लगा तो वह कभी नहीं धूल सकता. आप निष्कलंक रहे,इसी तरह आपका चरित्र बना रहे.

 सत्संग परिचर्चा में बाबाजी ने सभी को अपने गुणों को निखारने और दूसरों की निंदा ना करने का आवहान किया. सभी भक्तों में इस गुण का निर्माण हो इस हेतु उन्होंने अंधकार और प्रकाश से संबंधित  एक कथा का श्रवण भी कराया. 

एक समय अंधकार ब्रह्मा जी के पास जाकर कहता है कि आपने मुझे बनाया तो प्रकाश को क्यों बनाया तो ब्रह्मा जी कहते हैं तुम्हें प्रकाश से क्या परेशानी है, तब अंधकार कहता है कि प्रकाश जहां भी आता है मुझे वहां नहीं रहने देता तब प्रकाश को बुलाया जाता है और ब्रह्माजी उसे कहते हैं क्यों भाई तुम कभी भी अंधकार को कहीं से भी क्यों भगा देते हो तब प्रकाश कहता है कि नहीं प्रभु यह तो मैं अंधकार को कहता हूं कि मैं जहां भी जाता हूं वहां से अंधकार क्यों चला जाता है. तब ब्रह्माजी द्वारा सूचित किया कि इसका इस समस्या का समाधान दोनों को साथ में प्रस्तुत होकर ही किया जा सकता है लेकिन अंधकार और प्रकाश कभी भी साथ नहीं हो सकते और तो इस समस्या का समाधान कभी प्राप्ति ही नहीं हो पाया इसी प्रकार आप अपने मन को भी प्रकाशित रखिए अंधकार को छोड़ जब आप अपने मन को प्रकाशित करेंगे तो वह स्वयं ही वहां से चला जाएगा. अपने आप के गुणों को पहचानिए और उन गुणों को प्रकाशित कीजिए, दूसरों की निंदा ओं को त्याग कर अपनी विशेषताओं का पर ध्यान केंद्रित करें ताकि आप अपने आप को निखार सके और प्रकाशित कर सके.जो भी दुर्व्यवहार का अंधकार आपके आसपास भटक रहा है वह आपके चारित्रिक प्रकाश से दूर हो जाए, 

                 आप अपने जीवन को प्रकाशित कर पाए इस हेतु महाभारत के शांति पर्व की एक कथा भी बाबा जी ने सुनाई. एक समय भगवान श्री कृष्ण पांचो पांडव   के साथ वन यात्रा करते  हैं और रात्रि में उन्हें वन में रुकने की आवश्यकता होती है तब वह एक विशाल  वृक्ष के नीचे ठहर जाते हैं और वन में रहने वाले दानव के भय से वे सभी पारी पारी पहरा देने की बात कहते हैं.सर्वप्रथम भीम पहरा देते हैं, तब उन्हें किसी दानव की हंसने की आवाज सुनाई देती है तो वह नीचे होकर देखते हैं तो एक अंगूठे के आकार का दानव दिखाई देता है. दानव उन्हें ललकारता है कि आप मुझ से युद्ध करो तो भीम एक मुठिका उस पर प्रहार  करते हैं तो दानव का आकार बढ़ जाता है और दूसरी मुठिका में वह और बढ़ जाता है ऐसे में अर्जुन जागते हैं और भीम से कहते है कि आप इसे छोड़िए और निद्रा लीजिए मैं अभी दानव  को देखता हूं और अर्जुन बान  से उस दानव पर प्रहार करते हैं वह दानव  और बढ़ जाता है. क्रमशः दूसरे बाण से वह और बड़ा हो जाता है और ऐसा करते करते वह पहाड़ के आकार का हो जाता है तब श्रीकृष्ण भगवान जी जागते  हैं और अर्जुन को कहते हैं तुम सो जाओ मैं पहरा देता हूं और दानव  को मैं देखता हूं.भगवान श्री कृष्ण मुरली बजाते बैठ जाते हैं तब वह दानव  उनको ललकारता  हैं  और कहता है आप मुझ से युद्ध करो.श्री कृष्ण कहते हैं तुम  अपना काम करो मैं मेरा काम कर हूं तुम्हें भी मुरली की तान सुनना है तो आ जाओ नहीं तो तुम तुम्हारा काम करो दानव गुस्सा में आकर 1 फुट नीचे हो जाता है और फिर भगवान श्री कृष्ण को फिर से ललकार ता है भगवान श्रीकृष्ण उसकी बात को अनसुना करके अपने कार्य को करने लग जाते हैं तब वह दानव  क्रोध करते करते और छोटा होते होते वापस अपने अंगूठे के आकार का हो जाता है प्रातः  होते ही अर्जुन और सभी उठते हैं और देखते हैं तो वहां दानव  गायब होता है. और श्री कृष्ण के पितांबर में बंधा हैं तब भगवान कहते हैं कि आपने इस दानव की बुराइयों पर प्रहार करके उसे और बुरा बना दिया था इसलिए वह बढ़ते बढ़ते पहाड़ के आकार का हो गया था आप अपने गुणों को देखते हुए अपने गुणों को प्रकाशित करिए ना कि दूसरों के अवगुणों को 

 शिक्षा:- आप अपने ही गुणों पर अपना ध्यान केंद्रित करें


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